भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 455

४५४ फलदीपिका सुहृद्व्ययः स्वजनकुटुम्बविग्रहो रिपोर्भयं धनहरणं पदच्युतिः । गुरोर्गदश्चरणशिरोरुगुच्चकैः शिखी यदा विशति दशां विवस्वतः ॥१०॥ शिरोरुजा जठरगुदार्तिपीडनं कृषिक्रिया गृहधनधान्यविच्युतिः । सुतस्त्रियोरसुखमतीव देहिनां भृगोः सुते चरति रवेरथाब्दकम् ॥११॥ सूर्य (i) सूर्य की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में राजा से अधिक यश मिले, धनागम हो, पर्वतों और वनों में रहे, ज्वर और उष्णता के रोग हों, पिता के वियोग का भय हो । सूर्य अच्छा हो तो अच्छा फल लीजिये । सूर्य दुर्बल या दुःस्थान में हो तो अनिष्ट फल लीजिये । (ii) जब सूर्य की महादशा में चन्द्रमा का अन्तर हो तो जातक अपने शत्रुओं का नाश करे, उसके कष्टों की शान्ति हो जावे, धन का आगम हो, खेती बाड़ी का काम हो, मकान बने, मित्रों से समागम हो । यदि चन्द्रमा दुःस्थान में पड़ा हो या अशुभ फलदायक हो तो क्षय, तथा जल से उत्पन्न होने वाले रोग हों, अग्नि से भी हानि की सम्भावना है ॥४॥ (iii) जब सूर्य की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा हो तो जातक बीमार पड़े, पद्च्युत हो और शत्रुओं से पीड़ा हो । अपने कुल के आदमियों से विरोध हो । जातक को राजा से भय हो और धन का नाश हो । जातक को यह भी भय रहता है कि उसको चोट *ऊपर जो महादशा में अन्तर्दशा का फल दिया गया है उसी अनुसार इस अध्याय में सर्वत्र अन्तर्दशा में प्रत्यन्तर्दशा का फल समझना चाहिये ।