भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 684 में से

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पृष्ठ 470

इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६९ (i) बृहस्पति की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : सौभाग्य की वृद्धि हो, कान्ति बढ़े, सब ओर से मान-सम्मान मिले, पुत्र प्राप्ति हो, जातक के गुणों का उदय और राजदरबार में इज्जत हो। आचार्य और साधु-जनों से संयोग हो। मन की आकांक्षायें पूर्ण हों ॥३९॥ (ii) बृहस्पति की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : वेश्याओं की संगति हो, शराब पीना आदि दोषों की वृद्धि हो, सांसा- रिक स्थिति में उन्नति हो, सुख प्राप्ति हो, किन्तु जातक के कुटुम्ब और पशुओं को पीड़ा हो। धन बहुत अधिक खर्च हो। जातक के हृदय में सदैव भय बना रहे। आँखों में रोग हो और पुत्र को पीड़ा ॥४०॥ (iii) बृहस्पति की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : इस सम्बन्ध में दो मत हैं। एक मत यह है कि बृहस्पति में बुध की अन्तर्दशा अशुभ फल दिखाती है। स्त्रियों से संग हो, शराब पीने का घोर दुर्व्यसन हो और जातक जुआ खेले। वात, पित्त, कफ तीनों दोषों के कारण जातक बीमार पड़े। दूसरा मत यह है कि बृहस्पति की महा- दशा में बुध की अन्तर्दशा केवल शुभ फल देने वाली होती है। और जातक देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन करता है। पुत्र, धन और सुख की प्राप्ति होती है ॥४१॥ (iv) बृहस्पति की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : शस्त्र के व्रण होते हैं। नौकरों से विरोध बढ़ता है। चित्त में व्यथा रहती है, जातक के स्त्री और पुत्रों को कष्ट हो, गुरुजनों अथवा प्रियजनों से वियोग हो और जातक के स्वयं के प्राण जाने का भी कष्ट हो ॥४२॥ (v) बृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : अनेक प्रकार के धन, पशु, अन्न, वस्त्र, स्त्री, पुत्र, भोजन, पीने की वस्तुएँ, आभूषण, शयन-सुख, घर में काम में आने वाली वस्तुएँ प्राप्त