भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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॥ -> ॥५७॥ (ii) बुध की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : दुःख, शोक और कलह से मन व्याकुल रहे, जातक का बदन काँपे; शत्रुओं से समागम हो, खेत और सवारी नष्ट हो ॥५८॥ (iii) बुध की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : देवता, ब्राह्मण और गुरुओं का पूजन हो । दान और धर्म में जातक लगा रहे । वस्त्र और भूषणों की प्राप्ति हो । मित्रों से समागम हो ॥५९॥

Everything is checked and aligned accurately with the line markers.इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७५ मानहानिरथवाश्रयच्युतिः स्वक्षयोऽग्निविषतोयजं भयम् । मस्तकाक्षिजठरप्रपीडनं शीतरश्मिजदशां गतेऽसुरे ॥६३॥ व्याधिशत्रु भयविच्युतिर्भवे- द्ृ हासिद्धिरवनीशसत्कृतिः । धर्मसिद्धितपसां समुद्गमो देवमन्त्रिणि विदो दशां गते ॥६