फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 479, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें४७८ फलदीपिका अरिकृतकलहं नृपाग्निश्चौरै- भयमपि पन्नगजं वदन्ति तज्ज्ञाः । खलजनवचनं दुरिष्टचेष्टा तमसि गतेऽत्र शिखीन्द्रदायमाहुः ॥७१॥ सुतवरजननं सुरेन्द्रपूजा धरणिधनाप्तिरुपायनार्थसिद्धिः । धनचयजननं महीशमानो भवति गतेऽत्र गुरौ शिखीन्द्रदायम् ॥७२॥ परिजनविहतिं परोपतापं रिपुजनविग्रहमङ्गभङ्गतां च धनपदवियुतिं तथाहुराार्या गतवति सूर्यसुते शिखाधरायुः ॥७३॥ सुतवरजननं प्रभुप्रशस्तिः क्षितिधनसिद्धिररीश्वरप्रपीडा । पशुकृषिविहतिर्भवेत्तु पुंसां विशति बुधे शिखिवत्सरान्तरालम् ॥७४॥ (i) केतु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं से कलह हो, मित्रों से विरोध हो, अशुभ वचन सुनने पड़ें, शरीर में बुखार तथा तपिश की बीमारी हो (शरीर के किसी भाग में जलन या दाह) । दूसरे के घर जाना पड़े और धन का नाश हो ॥६६॥ (ii) केतु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : श्रेष्ठ ब्राह्मण से कलह हो, अपनी स्त्री तथा कुल के लोगों से