फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८० फलदीपिका हो, जगह-जगह से भेट मिले। राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त हो । इस अन्तर्दशा का फल उत्तम होगा ॥७२॥ (viii) केतु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : नौकरों की हानि हो, दूसरों से कष्ट मिले, शत्रुओं से झगड़ा हो, जातक का कोई अंग-भंग हो, स्थान, (नौकरी या मकान) छूटे और धन की हानि हो । इस अन्तर्दशा का बहुत अनिष्ट फल है ॥७३॥ (ix) केतु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : उत्तम पुत्र की उत्पत्ति हो, अपने मालिक से प्रशंसा प्राप्त हो, भूमि और धन की प्राप्ति हो किन्तु किसी बड़े शत्रु द्वारा जातक सताया जावे । पशु और खेती का नुकसान हो। इस अन्तर्दशा का मिश्रित फल है ॥७४॥ शुक्र की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल वसनभूषणवाहनचन्दना- द्यनुभवः प्रमदासुखसंपदः । द्युतियुतिः क्षितिपाद्धनलब्धयो भृगुसुते स्वदशां प्रविशत्यपि ॥७५॥ नयनकुक्षिकपोलगदोद्भवः क्षितिभृतो भयमस्ति शरीरिणाम् । गुरुकुलोद्भवबान्धवपीडनं भृगुसुतायुषि भानुमति स्थिते ॥७६॥ नखशिरोरदनक्षतिरुच्चकैः पवनपित्तरुगर्थविनाशनम् ।