फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवां अध्याय मिश्रदशा दस्रादितः पादवशेन मेषान्- मीनांशकान्तं क्रमशोऽपसव्यम् । कीटाद्ध्यान्तं गणयेच्च सव्य- मार्गेण पादक्रमशोऽजतारात् ॥१॥ (i) अश्विनी से तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका इनके १२ चरण हुए । मेष, वृष, मिथुन, कर्क यह अश्विनी के ४ नवांश हुए । सिंह, कन्या, तुला वृश्चिक यह भरणी के चार नवांश हुए । धनु, मकर, कुंभ, मीन यह चार नवांश कृत्तिका के हुए । इस क्रम से १२ नवांशों से इन तीन नक्षत्रों को विभाजित कीजिये । (ii) रोहिणी से तीन नक्षत्र-रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा--इन तीन नक्षत्रों के १२ नवांश हुए। इनको वृश्चिक से उलटा गिनकर—अर्थात् वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष, मेष, मीन, कुंभ, मकर, धनु इन १२ नवांशों में विभाजित कीजिये । रोहिणी प्रथम चरण का वृश्चिक, द्वितीय चरण का तुला.....इस क्रम से आर्द्रा चतुर्थ चरण का धनु नवांश हुआ । एवं भूयाच्चापसव्यं च सव्यं भानि त्रीणि त्रीणि विद्यात्क्रमेण । तद्राशीशप्रोक्तवर्षैर्दशास्य देवं प्राहुः कालचक्रे महान्तः ॥२॥