फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४० फलदीपिका शुभ होता है: १-२-४-७-८-१०-११* शुक्र से ३-४-५-७-९-१०-११ स्थानों में चन्द्रमा शुभ प्रभाव दिखाता है। शनि से ३-५-६-११ शुभ स्थान हैं और लग्न से ३-६-१०-११। इन स्थानों पर शुभ बिन्दु लगाने चाहियें। पृष्ठ ५३८ पर जो जन्म चन्द्रमा का अष्टक वर्ग कुण्डली दी गई है उसका चन्द्रमा का अष्टक वर्ग साथ में दिया गया है। इसमें कुल ४९ शुभ बिन्दु हैं जिनका विवरण निम्नलिखित है। ६ बिन्दु सूर्य से, ६ जन्मकालीन चन्द्रमा से, ७ मंगल से, ८ बुध से, ७ बृहस्पति से, ७ शुक्र से, ४ शनि से और ४ ही लग्न से शुभ स्थानों में डाले गये हैं। तीक्ष्णांशोर्गणितानके शिशिरगोर्लाक्षाय भूमेः सुतात् पुत्रीवासजनाय चन्द्रतनयाद्गोमेतके गीष्पतेः । तन्नाकारि सितात्तदा कुरुशनेः कोवासदाधेनुको लग्नात्स्वात्कलितं नयेत् क्षितिसुतः क्षेमप्रदो गोचरे ॥५॥ अब मंगल का अष्टक वर्ग बनाना बताया जाता मंगल के अष्टक वर्ग में निम्नलिखित शुभ स्थान हैं। *वराहमिहिर और मन्त्रेश्वर का इस विषय में मतभेद है। वराहमिहिर के मत से जन्मकालीन बृहस्पति से १-४-७-८-१०-११-१२ इन स्थानों में चन्द्रमा शुभ होता है।