भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५६ फलदीपिका किया जाय तो इसे दश वर्ग विचार कहते हैं। नीचे दसों वर्गों के चक्र दिये जाते हैं जिससे स्पष्ट होगा कि किस राशि में किस अंश, कला' विकला तक किस राशि का वर्ग रहता है।

होरा चक्र

मे०बृ०मि०क०सिं०क०तु०बृ०ध०म०कु०मी०रा०
सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०अं०१५
चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०चं०सू०अं०३०

द्रेष्काण चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०क०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०रा०
१०१११२१ से १० अंश
१०१११२११ से २० अंश
१०१११२२१ से ३० अंश

सप्तमांश चक्र

भागमे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अंश
प्रथम भाग१०१२११४-१७-८
द्वितीय ,,१११०१२८-३४-१७
तृतीय ,,१०१२१११२-५१-२५
चतुर्थ ,,१११०१२१७-८-३४
पंचम ,,१२१११०२१-२५-४२
षष्ठ ,,१०१२११२५-४२-५१
सप्तम ,,१११०१२३०-०-०
यदि तीस अंशों को ७ से भाग दिया जावे तो ४ अंश १७ कला ८
विकला ३४ विकला आदि आता है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से ४-१७-८
लिखा है। विकला के भाग छोड़ दिये हैं क्योंकि स्पष्ट ग्रह विकला तक
ही किये जाते हैं।