फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७० फलदीपिका कीजिये । इसी प्रकार ३ को—धनु राशि में जो ४ संख्या है उसमें से घटाकर धनु राशि के नीचे ४-३=१ यह संख्या स्थापित कीजिये । मेष में ३-३=० रहेगा । इसी प्रकार सूर्याष्टक वर्ग में वृष, कन्या, मकर—इन तीनों त्रिकोण राशियों को लीजिये—वृष में ७ संख्या है, कन्या में ३ तथा मकर में ३ । इन तीनों में अर्थात् ७ तथा ३ तथा ३ में—३ सबसे कम है । इस कारण ३ को ७ में से घटाकर वृष में ४ तथा कन्या में ३-३ =० एवं मकर में ३-३=० रखिये यह सामान्य नियम होना चाहिये । अब मिथुन, तुला तथा कुंभ राशियों में सूर्याष्टक वर्ग में कितने बिन्दु हैं यह देखिये । मिथुन में ४, तुला में ४ तथा कुंभ में ५ हैं। उपर्युक्त नियम के अनुसार सब से कम संख्या ४ है, इसलिये इस ४ को—तीनों राशि की संख्याओं में से-प्रत्येक में से घटाकर मिथुन में ४-४=०, तुला में ४-४=० तथा कुंभ में ५-४=१ स्थापित करना चाहिये यह सामान्य नियम हुआ । अब चौथा त्रिकोण लीजिये अर्थात् सूर्याष्टक वर्ग की कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियाँ । कर्क में ४ संख्या है, वृश्चिक में ५ तथा मीन में १ । इनमें सबसे कम संख्या १ है । इसलिये इस १ को कर्क वाली ४ संख्या में से घटाकर कर्क में ४-१=३ रखिये तथा वृश्चिक में ५-१=४ स्थापित कीजिये । मीन में तो १-१=० हो ही जावेगा । इस नियम को जिसे "प्रथम-मत" के नाम से ऊपर समझाया गया है—हम निम्नलिखित प्रकार से निर्दिष्ट कर सकते हैं: (क) त्रिकोण की तीन राशियों में—जिसमें सबसे कम संख्या है—उस सबसे कम वाली संख्या को--त्रिकोण की दोनों राशियों में से अलग-अलग घटाकर जो शेष बचें, उन-उन शेष को--उन-उन राशियों के नीचे स्थापित करे ।