भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९३ शत्रुक्षेत्रे त्रिभागोनं दृश्यार्द्धहरणं तथा । त्र्यंशोनहरणं भङ्गे सूर्येन्द्वोः पातसंश्रयात् ॥३०॥ (१) यदि कोई ग्रह शत्रु राशि में हो तो उसकी दशा का जो समय आया हैं उसका एक तिहाई कम कर दीजिये । (२) यदि कोई ग्रहदृश्यार्द्ध (१२वें घर, ११वें घर, १०वें घर ९वें घर आदि-जितना मार्ग पृथ्वी के ऊपर है) में हो तो भी एक-तिहाई दशा कम कीजिये । (३) जो ग्रह अन्य ग्रह के साथ (उसी राशि अंश में होने से) होने से युद्ध में पराजित हो या सूर्य या चन्द्रमा के पात के अन्तर्गत हो-उसकी दशा में भी एक-तिहाई कम कीजिये । बहुत्वे हरणे प्राप्ते कारयेद्बलवत्तरम् । पश्चात्तान् सकलान् कृत्वा वराङ्गेन विवर्द्धयेत् ॥३१॥ मातङ्गलब्धं शुद्धायुर्भवतीति न संशयः । पूर्ववद्दिनमासाब्दान् कृत्वा तस्य दशा भवेत् ॥ ३२॥ यदि हरण की अनेक परिस्थिति जो ऊपर बताई गई है-उपस्थित हों तो--जिस परिस्थिति में सबसे अधिक हरण होता है--केवल उस परिस्थिति के अनुसार जो हरण आता हो उतना कम कर दीजिये । अन्यहरण छोड़ दीजिये । इस प्रकार जो आयु आवे इसे ३२४ से गुणा कीजिये ओर ३६५ से भाग दीजिये । जो वर्ष, मास दिन आवे वह दशा होगी , एवं ग्रहाणां सर्वेषां दशां कुर्यात् पृथक् पृथक् । अष्टवर्गदशामार्गः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ॥३३॥