भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 684 में से

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६२२ फलदीपिका उदाहरण के लिये पृष्ठ ६१९ पर जो चन्द्र कुण्डली (वृष राशि में चन्द्रमा है—इसलिये वृष से गणना की गई) दी गई है उसका विचार करना है । कर्क में जब सूर्य होगा तो वृषभ, मिथुन, कर्क इस प्रकार गोचर से सूर्य तृतीय होगा । यह शुभ है । इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये । लाभविक्रमखशत्रुषु स्थितः शोभनो निगदितो दिवाकरः । खेचरैः सुततपोजलान्त्यगैः व्यार्किभिर्यदि न विद्ध्यते तदा ॥३॥ ऊपर श्लोक में गोचर से प्रत्येक ग्रह के शुभ स्थान बताये गये हैं। इस नियम का एक प्रतिवाद है अर्थात् इस नियम के ऊपर एक दूसरा नियम और है—जो उस परिस्थिति को बतलाता है जिस हालत में श्लोक २ में लिखा हुआ नियम लागू नहीं होगा । वह यह है । श्लोक ३ से ८ तक यही अपवाद—विशेष नियम बताये गये हैं । सूर्य तृतीय में शुभ होगा किन्तु यदि नवें स्थान में चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु, केतु इन ग्रहों में से कोई ग्रह जा रहा हो तो सूर्य तृतीय में शुभ नहीं होगा । इसे वेध कहते हैं । सूर्य का पुत्र शनि है । चन्द्रमा का पुत्र बुध है । सूर्य तृतीय में जब हो तब नवम में शनि के अलावा कोई ग्रह हो तो सूर्य का वेध होता है । सूर्य का पुत्र शनि है । पिता पुत्र का या पुत्र पिता का वेध नहीं करता है । इसी कारण नवम में जो ग्रह वेध कारक बताये गये हैं उनमें शनि नहीं लिखा है । वेध का विचार हमने अपनी पुस्तक 'सुगम ज्योतिष प्रवेशिका' में लिखा है । उसे देखें । वेध के सम्बन्ध में दो विचार हैं । मान लीजिये कर्क का सूर्य वृषभ से तृतीय है । अब 'नवम' कहाँ से गिनना ? वृष राशि (जहाँ जन्म कुंडली में चन्द्रमा है वहाँ) से नवम गिनना या

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