भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२५ अन्तर केवल यह है कि सूर्य, चन्द्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, यह सब मंगल का वेध करते हैं किन्तु सूर्य शनि का पिता होने के कारण, शनि का वेध नहीं करता। केवल चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, शनि का वेध करते हैं। स्वाम्बुशत्रुमृतिकायगः शुभो ज्ञस्तदा न खलु विध्यते सदा । स्वात्मजत्रितप आद्यनैधन प्राप्तिगैर्विबुधभिर्यदि ग्रहैः ॥६॥ बुध के शुभ गोचर स्थान २, ४, ६, ८, १०, ११ वेध स्थान ५, ३, ९, १, ८, १२ स्वायधर्मतनयास्तसंस्थितो नाकनायकपुरोहितः शुभः। रिःफरन्ध्रखजलत्रिगैर्यदा विध्यते गगनचारिभिर्न हि ॥७॥ बृहस्पति के शुभ गोचर स्थान २, ५, ७, ९, ११ वेध स्थान १२, ४, ३, १०, ८ आसुताष्टमतपोव्ययायगो विद्ध आस्फुजिदशोभनः स्मृतः। नैधनास्ततनुकर्मधर्मधीलाभवैरिसहजस्थखेचरैः ॥८॥ शुक्र के शुभ गोचर स्थान १, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, १२ वेध स्थान ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ३, ६ जन्मन्यायासदाता क्षपयति विभवान् क्रोधरोगाध्वदाता वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति न सुखदो वञ्चनामाग्रहं च ।