भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 635

६३४ फलदीपिका

राशि और उसके बाद की राशियों को द्वितीय, तृतीय इस प्रकार गणना करनी चाहिए । (१) देश या अपने स्थान से बाहर जाना, धन का अत्यन्त व्यय या नाश, शत्रुता आदि अनिष्ट फल । (२) धन प्राप्ति, कुटुम्ब सुख, अपनी वाणी का इष्टफल, उसकी बात को लोग ध्यान से सुनें या अपनी वाणी द्वारा धन प्राप्त हो । (३) स्थिति नाश— जगह छूटे या स्थान छूटे या आर्थिक या सामाजिक स्थिति में अंतर आये, अपने इष्ट जनों से वियोग, कार्य में विघ्न, रोग आदि दुष्ट फल (४) बन्धुओं से दुःख दीनता, चौपायों से भय । (५) पुत्र की उत्पत्ति, सन्तान सुख, सज्जनों से समागम, राजा की कृपा आदि शुभ फल । (६) अपने दायादों (चचेरे भाई आदि) तथा शत्रुओं से पीड़ा, रोग आदि अशुभ फल । (७) किसी शुभ कार्य से यात्रा, अपनी स्त्री से सुख, पुत्र प्राप्ति आदि शुभ फल । (८) मार्ग क्लेश—व्यर्थ यात्रा से परिश्रम, अशुभ फल, धन नाश, विविध प्रकार के कष्ट । (९) सर्वसौभाग्य, सिद्धि—भाग्योदय, कार्य में सफलता आदि शुभ फल । (१०) धन कष्ट, स्थान कष्ट (नौकरी या ओहदे में कमी या सम्मान में कोई बट्टा । संतान पीड़ा आदि अशुभ फल । (११) पुत्र लाभ, स्थान लाभ (नयी जगह या ओहदा मिले या अपनी जगह में ही इज्जत बढ़े), सम्मान वृद्धि आदि शुभ फल । (१२) द्रव्य सम्बन्धी दुःख, भय, चिन्ता उद्वेग आदि अशुभ फल ॥ १८-२० ॥ अखिलविषयभोगं वित्तसिद्धिं विभूतिं सुखसुहृदभिवृद्धिं पुत्रलब्धिं विपत्तिम् । दिशति युवतिपीडां सम्पदं वा सुखाप्तिं कलहमभयमर्थप्राप्तिमिन्द्रारिमन्त्री ॥ २१ ॥ शुक्र शुक्र का गोचर फल निम्नलिखित है । (१) सब प्रकार का भोग । (२) धनागम । (३) धन वृद्धि—