फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ फलदीपिका सिंहाजाशिवितुलानृयुग्मभवनेष्वन्त्या ह्यजादिमाः मध्यौ स्त्रीयमयोरिहायुधभृतः पाशोलिमध्यो भवेत् । नक्राद्यो निगलो मृगेन्द्रघटयोराद्यो वणिङ्मध्यमो गृध्रास्यो वृषभांतिमश्च विहगः कर्क्यादि कोलाननम् ॥१३॥ कौर्याद्यः कर्कटान्त्यो झषचरममहिश्वाजगोमध्यसिंहा- द्यल्यन्त्यं स्याच्चतुष्पादिह फलमधनक्रूरनिन्द्या दरिद्राः । द्वन्द्वर्क्षे स्युर्दृगाणैरधमसमशुभान्यस्थिरे चोत्क्रमेण प्राहुस्तज्ज्ञाः स्थिरक्ष्वशुभशुभसमान्येव लग्न फलानि ॥१४॥ इन द्रेष्काणों का स्वरूप बताते हैं। निम्नलिखित द्रेष्काण हैं । ' प्रथम द्रेष्काण द्वितीय द्रेष्काण तृतीय द्रेष्काण मेष आयुध चतुष्पाद आयुध वृष चतुष्पाद पक्षी मिथुन आयुध आयुध कर्क कोलानन सर्प सिंह गृध्रास्य आयुध चतुष्पाद कन्या आयुध तुला गृध्रास्य आयुध वृश्चिक सर्प पाश चतुष्पाद धनु आयुध आयुध मकर निगड कुंभ गृध्रास्य मीन सर्प फलदीपिका की एक संस्कृत प्रति में द्रेष्काण का स्वरूप वर्णन करने वाले श्लोक १३ और १४ नहीं हैं। अन्य प्रति में सिंह के आद्य ( प्रथम )