भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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६८ फलदीपिका होते हैं। वह चतुर दीर्घायु, दयावान्, पवित्र, यशस्वी राजाओं के सदृश भोग भोगने वाला होता है। उसको पुत्र सुख प्राप्त होता है और वह् धनी भी होता है ॥ १५ ॥ मान्दिस्थराशिपतिसङ्गतसुत्रिकोणं तस्यांशराशिपतिसंयुतमंशकोणम् । लग्नं वदन्ति गुलिकांशकराशिकोणं तद्वद्विधौ बलयुते शशिनैव विद्यात् ॥ १६ ॥ यह देखिये कि किस राशि में मान्दि है और मान्दि राशि (जिस राशि में मान्दि है) का स्वामी कहाँ है। जातक का जन्म लग्न इन दोनों राशियों से त्रिकोण में (नवम या पञ्चम) होगा अथवा मान्दि जिस नवांश में है उससे नवम पञ्चम या मान्दि राशि नवांश का जो स्वामी है वह जिस नवांश में बैठा है उससे नवम या पञ्चम जन्म लग्न होगा। अथवा गुलिक जिस नवांश में है उससे पञ्चम या नवम। यहां लग्न निश्चय करने के लिये कुछ हिदायतें दी गई हैं उनको अमल में लाने के पूर्व क्या निश्चय करना चाहिये यह ऊपर बताया गया है। नवीन ज्योतिषियों के हितार्थ इसे पुनः समझाया जाता ह। प्रथम द्वितीय तृतीय चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) शुभ सम अधम स्थिर राशि अशुभ शुभ सम (वृष, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) द्विस्वभाव राशि अधम सम शुभ (मिथुन, कन्या, धनु, मीन) उपर्युक्त फल लग्न राशि, चर है, स्थिर या द्विस्वभाव, प्रथम द्रेष्काण उदय हो रहा है, द्वितीय या तृतीय यह निश्चित कर कहना चाहिये ।