भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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( ४ ) नियमपूर्वक तपस्या कर देवताराधन में सफल हुए । तब इनका नाम मंत्रेश्वर हुआ । १५० वर्ष की आयु में योगक्रिया द्वारा इस ऐहिक शरीर का त्याग किया । अखिल विद्याओं का अध्ययन और तपस्या के कारण इनका ज्योतिष का भी अगाध ज्ञान था और इस फलदीपिका में बहुत-से ज्योतिष के फलादेश प्रकार इतने अपूर्व और गंभीर हैं कि पाठक मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते । फलदीपिका ग्रंथ फलित ज्योतिष की प्रौढ़ रचना है । हिन्दी व्याख्या के साथ-साथ मूल श्लोक भी दे दिये गये हैं जिससे सहृदय संस्कृत प्रणयी मूल का रसास्वाद कर, मंत्रेश्वर की सुललित पदावली से प्रकर्ष हर्ष का अनुभव कर सकें । ग्रंथ की महत्ता, उपादेयता या बहुविषयकता की व्याख्या करना व्यर्थ है, क्योंकि पुस्तक पाठकों के सम्मुख है । आशा है अधिकारी वर्ग, ज्योतिष की विविध परीक्षाओं के लिये जो पाठ्य पुस्तकें निर्धारित की जाती हैं, उनमें इस फलित विषयक अमूल्य ग्रंथ का भी सन्निवेश करेंगे, जिससे विद्यार्थी अपने भावी जीवन में विशेष सफल ज्योतिषी हो सकें । विद्वानों से निवेदन है कि इस पुस्तक के अग्रिम संस्करण के लिये यदि कोई परामर्श देना चाहें तो निम्नलिखित पते से पत्र-व्यवहार करें । सारावली में लिखा है : यदुपचित मन्य जन्मनि शुभाशुभं कर्मणः पक्तिम् । व्यञ्जयति शास्त्र मेतत्तमसि द्रव्याणि दीप इव ॥ अर्थात् पूर्वजन्म में जो शुभ या अशुभ कर्म जातक ने किये हैं उनका फल, अंधकार में रक्खी हुई वस्तुओं को दीपक की भांति ज्योतिष शास्त्र दिखाता है । ज्योतिष कल्पद्रुम के तीन स्कन्ध हैं 'हिता, सिद्धान्त तथा होरा । होरा के अन्तर्गत जन्म या प्रश्न कुण्डली का फलादेश आता है । उन्हीं फलों को दिखाने के लिये यह रचना फल-दीपिका है । विजय दशमी गोपेशकुमार ओझा विक्रम संवत् २००० ९३ दरियागंज, दिल्ली-६ टेलिफोन २७१७२८