भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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तीसरा अध्याय : वर्ग भेद ७१ से 'हारा' हुआ हो उसे निपीडित कहते हैं। जो पाप ग्रह या ग्रहों के वर्ग में हो उसे खल कहते हैं। जो शत्रु गृह में हो उसे पूर्ण दुःखी और जो अपनी नीच राशि में हो उसे अतिभीत कहते हैं । प्रायः जैसा कि प्रदीप्त सुखित, स्वस्थ, मुदित, शान्त, शक्त, निपीडित, खल, सुदुःखित, नीच और विकल यह जो ११ अवस्थायें बतायी गई हैं—इनमें नाम के अनुसार ही फल १. 'हारा' हुआ ग्रह किसे कहते हैं । जब दो ग्रह एक ही राशि, अंश कला में हों तो दो दोनों ग्रह परस्पर युद्ध में हैं—ऐसा समझा जाता है। दोनों ग्रहों का स्थानबल दिक्बल और कालबल निकालना चाहिये । षड्बल छः प्रकार के बलों के योग को कहते हैं (१) स्थान बल (२) काल बल, (३) दिक् बल, (४) अयन बल, (५) चेष्टाबल, (६) नैसर्गिक बल। परन्तु युद्धबल निकालने के लिये (१), (२); (३) का योग करते हैं । जो दो ग्रह युद्ध में हों—उनके बलों को देखिये अधिक बल में से कम को घटाइये । जो बचे उसे उन दोनों के विव परिमाण के अन्तर से भाग दीजिये । जो भजन फल आवे—उसे उस ग्रह के बल में जोड़िये, जो उत्तर हो और उस ग्रह के बल में से घटाइये जो दक्षिण हो । जो ग्रह उत्तर को है वह जीता हुआ और जो दक्षिण को है वह हारा हुआ समझा जाता है । ग्रहों के बिंब परिमाण निम्नलिखित हैं :— ग्रह बिंब परिमाण मंगल ९.४ विकला बुध ६.६ ,, बृहस्पति १९०.४ ,, शुक्र १६.६ ,, शनि १५८.० ,,