भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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९४ फलदीपिका चन्द्रवेला-फल मूर्द्धामयो मुदितता यजनं सुखस्थो नेत्रामयः सुखितता वनिताविहारः । उग्रज्वरः कनकभूषणमश्रुमोक्षः क्ष्वेला नं निधुवनं जठरस्य रोगः ॥ १७ ॥ क्रीडा जले हसनचित्रविलेखने च क्रोधश्च नृत्तकरणं घृतभुक्तिनिद्रे । दानक्रिया दशनरुक् कलहः प्रयाण- मुन्मत्तता च सलिलाप्लवनं विरोधः ॥ १८ ॥ स्वेच्छास्नानं क्षुद्भयं शास्त्रलाभं स्वैरं गोष्ठी योधनं पुण्यकर्म । पापा चारः क्रूरक र्मा प्रहर्षं प्राज्ञैरेवं चन्द्रवेला प्रदिष्टा ॥ १९ ॥ ३६ चन्द्र वेलाओं का फल निम्नलिखित है :- (१) सिरदर्द, (२) प्रसन्नता, (३) यज्ञ करना, (४) सुखी या सुखपूर्वक बैठा हुआ, (५) नेत्र रोग, (६) सुखी होना, (७) स्त्रियों से विहार, (८) तीव्र ज्वर, (९) सोने के आभूषण, (१०) नेत्रों से आंसू बहाते हुए, (११) जहर खाना, (१२) संभोग करना । (१३) पेट का रोग, (१४) जल में क्रीड़ा करना, हंसना, चित्रकला करना, (१५) क्रोध, (१६) नृत्य करना, (१७) घी खाना, (१८) सोना (निद्रा), (१९) दान देना, (२०) दांत का रोग, (२१) कलह (झगड़ा), (२२) यात्रा करना, (२३) उन्मत्तता, (नशा या पागलपन), (२४) पानी में तैरना । (२५) विरोध, (२६) अपनी इच्छा से स्नान करना, (२७) भूख, (२८) भय, (२९) शास्त्राध्ययन, (३०) अपनी मनमानी करने वाला, (३१) गोष्ठी (दोस्तों के साथ गपशप), (३२)युद्ध करना, (३३) पुण्य कर्म, (३४) पापाचार, (३४) क्रूर कर्म करने वाला, (३६) हर्ष ॥१९॥