प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश १०४) किसी समय, सान्धिविग्रहिकों द्वारा डाहल देशके राजाका निम्न लिखित श्लोक, जो यमल पत्र (मित्रताका संबंध सूचक पत्र) पर लिखा हुआ था, सुनाया गया- १४६. आ-युक्त हो कर लोकमें प्राणदान करता है, वि-युक्त हो कर मुनियोंको प्रिय होता है, सं-युक्त हो कर सर्वथा अनिष्ट कारक बनता है और केवल-अकेला होने पर स्त्रियोंका प्रिय बनता है। राजाने पूछा कि 'इसमें क्या बात है?' उन्होंने कहा- 'आपके देशमें एक-से-एक प्रधान ऐसे बहुतसे विद्वान् रहते हैं। सो उनसे इस दुर्बोध्य श्लोककी व्याख्या कराइये।' उनकी यह बात सुन कर सभी विद्वान् उसका अर्थ सोचने लगे पर किसीकी समझमें नहीं आया। राजाने आचार्य हेमचन्द्र से पूछा। उन्होंने इस प्रकार व्याख्या की- 'इसमें 'हार' शब्दका अध्याहार है। उसके साथ 'आ' उपसर्गका योग होनेसे 'आहार' बनता है जो सब जीवोंको प्राण देता है। 'वि' उपसर्गके योगसे 'विहार' बन कर दोनों तरहसे यतियोंका प्रिय होता है। 'सं' के योगसे 'संहार' बनता है जो सर्वथा अनिष्ट लगता है और बिना किसी उपसर्गके स्त्रियोंका प्रिय आभूषण गलेका 'हार' होता है।' * १०५) एक दूसरी बार, सपादलक्ष देशके राजाने 'उगी हुई चन्द्रकला तो गौरीके मुखकमलका अनुहार नहीं कर सकती।' इस प्रकारकी समस्यावाला आधा दोहा यहाँ पर (पाटनमें) भेजा। अन्यान्य उन कवियोंके उसकी पूर्ति न करने पर '(और) जो न देखी गई वैसी प्रतिपदाकी चन्द्रकलाकी उपमा दी कैसे जाय।' इस प्रकारका उत्तरार्द्ध कह कर मुनीन्द्र हेमचन्द्रने उसको पूर्ण किया। * सिद्धराजका सौराष्ट्रके राजा खंगारको विजय करना। १०६) श्रीसिद्धराजने, नवघण नामक आभीर राणाका निग्रह करनेमें, पहले ग्यारह बार अपनी सेनाका पराजित होना जान कर, बर्द्धमान (वडधाण) आदि नगरोंमें बड़े बड़े प्राकार बनवा कर, स्वयम् ही उसके लिये प्रयाण किया। उस (नवघन) के भगिनी पुत्रने [किलेका रहस्य आदि बतलानेवाले] संकेत देते समय यह वचन लिया था कि 'किलेका कब्जा करते समय इस नवघन को सिर्फ द्रव्यमारसे मारना (अर्थात् भारी दण्ड दे कर द्रव्य वसूल करना), लेकिन किसी शस्त्रके मारसे नहीं मारना।' [राजाके किल सर कर लेने पर] उस नवघनको उसकी स्त्रीने कहीं अन्दर छुपा दिया जिसको राजाने उस विशाल महलमेंसे बहार खींच निकाला और धनके भरे हुए बर्तनोंसे उसे पीट पीट कर मार डाला। उसकी स्त्रीको यह कह कर कि 'इसको हमने द्रव्यके मारसे ही मारा है' अपने वचनका पालन बतलाया और उसे शांत किया। शोकसे निमग्न उसकी रानी [सूनलदेवी] के ये वाक्य कहे जाते हैं- १४८. वह राणा स्वघरमें नहीं है। न कोई उसे लाया है, न कोई लायेगा। खंगारके साथ मैं स्वयं अपने प्राण अग्निमें क्यों न होम दूँ। १४९. और सब राणा तो बनिये हैं और उनमें यह जेसल (जय सिंह) बड़ा सेठ है। हमारे गढके नीचे इसने यह कैसा व्योपार मांड रखा है। १५०. हे गौरवशाली गिरनार तैंने क्यों मनमें मात्सर्य धारण कर लिया है ? खंगार के मरने पर तैंने अपना एक शिखर भी नहीं गिराया।