भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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८२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश बजाये गये, डंकोंकी चोटसे मानों आकाशका पेट गुड़गुड़ा रहा था और उत्तम प्रकारकी दुंदुभियोंके नादसे दिगंतराल भरा जा रहा था। राजाने स्वयं अपने हाथका अवलंबन दे कर, 'हे वादि चक्रवर्ती, पधारिये !' ऐसी स्तुतिपूर्वक उन्हें राजसभासे प्रस्थान करवाया। वाहड नामक उपासकने उस समय तीन लाख [द्रम्म] याचकोंको दान किये। इस तरह जगत्के आनंद स्वरूप कन्द (मूल) के कन्दल (अंकुर) समान मंगलके वारंवार उच्चारित होने पर, उसी वाहड द्वारा बनवाये गये श्रीमहावीर देवके प्रासाद (मन्दिर) में, देवको नमस्कार करने बाद, उसीकी वसति (उपाश्रय) में जा कर उन्होंने आश्रय लिया। सूरिकी अनिच्छा होने पर भी राजाने उनको पारितोषिकके रूपमें छाला आदि बारह गांव भेंट दिये। [भिन्न भिन्न समर्थ आचार्यों द्वारा की गई ] उनकी स्तुतिके कुछ श्लोक इस प्रकार हैं- १६१. जिनके प्रसाद-ही-का मानों सुखप्रश्वके समय दर्शन (श्वेतांबर संप्रदाय) उच्चारण करता है, उन वस्त्रप्रतिष्ठाचार्य श्रीदेवसूरिको नमस्कार है। -इस प्रकार श्रीप्रद्युम्नाचार्यने कहा। १६२. यदि सूर्यके समान देवाचार्य, कुमुदचंद्रको न जीत पाते तो कौन श्वेतांबर, संसारमें कटिमें वस्त्र पहनने पाता ।- इस प्रकार हेमाचार्यने कहा। १६३. जिस नग्नने कीर्तिरूपी कंथा उपार्जन करके अपना व्रतभंग किया था, देवसूरिने उस कंथाको छीन कर उसे निर्ग्रन्थ (नंगा) कर दिया। - इस प्रकार श्री उदयप्रभ देवने कहा। १६४. अभी तक भी जिन्होंने खेल-शालाका त्याग नहीं किया उन देवसूरि (बृहस्पति) के साथ, वादविद्याको जानने वाले प्रभु देवसूरिकी, तुलना कैसे की जाय।- इस प्रकार श्री मुनिदेवाचार्यने कहा। १६५. जिनकी प्रतिभाके घाम-तेजसे [त्रस्त हो कर] कीर्तिरूपी योगवस्त्रका त्याग कर देने वाले [उस] नग्न [दिगंबर] को भारती ने मानों लाजके कारण छोड़ दिया, वह देवसूरि तुम्हारा कल्याण करें। १६६. अशेष केषोलियोंकी मुक्ति स्थापन कर जो सत्राकार बने तथा स्त्रियोंकी मुक्तिके युक्त उत्तर द्वारा मोक्ष तीर्थ बने, और नग्नको जीत लेने पर श्वेताम्बरशासनके प्रतिष्ठागुरु बने, उन प्रभु श्री देवसूरिकी महिमा, देवता और गुरुकी अपेक्षा भी अपरिमित है।- इस प्रकार दो श्लोक श्री मेरुतुंगसूरिने कहे। इस प्रकार यह देवसूरिका प्रबन्ध समाप्त हुआ। * पत्तनके वसाहू आभडका वृत्तान्त । ११०) इसके बाद, पत्तनका रहने वाला, जिसका वंश विलुप्त हो गया है ऐसा, आभड नामक एक वणिकपुत्र कंसारेकी दुकान पर, गागर घिसनेका काम, किये करता था। उसको वहा रोज पाँच विशोपकका उपार्जन होता था। वह अपना सारा दिन उस काममें व्यतीत कर, दोनों शाम प्रभु श्री हेम सूरिके चरणोंके पास बैठ कर प्रतिक्रमण किये करता था। स्वभाव-ही-से चतुर होनेके कारण उसने अगस्त्य और बौद्ध मत आदिके

  • रत्न परीक्षा के ग्रंथोंको पढ़ डाला और रत्नपरीक्षकोंके निकट रह कर उस परीक्षामें दक्ष हो गया। किसी समय, श्री हेमचंद्र मुनीन्द्रके निकट उसने, धनाभावके कारण, स्वल्प प्रमाणमें परिग्रह-परिमाण व्रतका नियम लेना चाहा। सामुद्रिक विद्याके जानकार प्रभुने मणिबंधमें उसके भाग्य वैभवका खूब प्रसार होना जान कर, तीन लाख द्रम्मसे अधिक द्रव्य न रखनेका उसे नियम कराया। इसके बाद, संतोष पूर्वक वह अपना व्यवहार