भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण, ११२-११६ ] सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । [ ८५ सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । ११४) एक दूसरी बार, राजाने वालक देशकी दुर्गभूमि ( पहाड़ी जमीन ) में सिंहपुर नामका प्रदेश ब्राह्मणोंको रहनेके लिये दे दिया और उसके अधीन १०६ ग्राम दान कर दिये । पर वहा पर सिंहका डर देख कर ब्राह्मणोंने सिद्धराज से प्रार्थना की कि, उन्हें कहीं देशके भीतर निवास दिया जाय । इस परसे राजाने उनको साभ्रमती के तीर परका आसात्रिली ग्राम दे दिया, और सिंहपुर से धान्य लानेमें जो आते जाते कर लगता था उसे माफ कर दिया गया । वाराहीके पटेलोंको त्रूचाका विरुद्ध देना । ११५) बादमें, राजा सिद्धराज ने किसी समय, मालव देश की यात्राके लिये प्रयाण किया । रास्तेमें वाराही ग्राम के पास जब वह आया तो उस गाँवके पटेलों (मुखियों) को बुला कर, उनकी चतुरताकी परीक्षाके लिये, अपनी एक प्रधान पालकी, उनको अपने पास थातीके रूपमें रखनेके लिये दी । राजाके आगे प्रयाण कर जाने पर उन सभीने मिल कर, उसके एक एक हिस्सेको अलग अलग कर, यथोचित रूपसे सबने अपने अपने घर पर संभालके रखा । यात्रासे लौटते समय राजाने अपनी रखी हुई उस थातीको जब उनसे माँगी, तो उन्होंने अलग अलग किये हुए उसके वे सब टुकडे लाके दिये । यह देख कर राजाने आश्चर्यसे पूछा कि- ' यह क्या बात है ?' तो उन्होंने विज्ञापना की कि- 'महाराज ! [ इनमेंसे ] कोई एक आदमी तो इसकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकता । कभी चौर और अग्नि आदिका उपद्रव हो जाय तो फिर स्वामीके सामने कौन जवाबदेह हो - यही सोच कर हम लोगोंने यह ऐसा किया है।' तब राजा मनमें खूब आश्चर्यचकित हुआ और उनको 'त्रूच *' ऐसा विरुद्ध उसने दिया । इस प्रकार यह वाराहीय त्रूच प्रबंध समाप्त हुआ । * उञ्झाके ग्रामीणोंसे वार्तालाप । ११६) इसके बाद, एक बार राजा श्री जय सिंह देव, मालव विजय करके लौट रहे थे तब रास्तेमें पडने वाले उञ्झा ग्राम में खीमे डाले गये । वहाके ग्रामीणोंने, जिनको राजा मामा कहा करता था, दूधसे भरे हुए हडों आदिके उचित सत्कारसे राजाको सन्तुष्ट किया । उसी रातको, राजा गुप्त वेष करके उनके दुख- सुख जाननेकी इच्छासे, किसी ग्रामीणके घर पर चला गया । वह (ग्रामीण) गाय दुहने आदिके कामोंमें व्यस्त होता हुआ भी, उसने पूछा कि- 'तुम कौन हो?' [इत्यादि। इसके उत्तरमें उसने] कहा कि- मै श्री सोमेश्वरका कार्पटिक (यात्री) हूं; महाराष्ट्र देश का रहने वाला हूं।' उसने फिर उससे महाराष्ट्र देश और उसके राजाके गुण-दोष आदि पूछे । उसने वहाके राजाके ९६ गुणोंकी प्रशंसा करते हुए, उस ग्रामीणसे गूर्जर देशके राजाके गुण-दोष पूछे । इस पर वह श्री सिद्धराज के प्रजा-पालन-दक्षत्व और सेवकों पर अनुपम प्रेम इत्यादि गुणोंका वर्णन करने लगा। तब बीचमें उसने राजाका कोई कृत्रिम दोष बताना चाहा, तो वह आँसू गिराता हुआ बोला कि- 'हम लोगोंके मंद भाग्यसे राजाको कोई पुत्र नहीं है और यही उसमें एक दोष है'। इस प्रकार निष्कपट भावसे उसने उससे सब कह कर उसे सतुष्ट किया । फिर प्रभात कालमें सब लोग मिल कर राजाके

  • यह 'त्रूच' कोई देश्य शब्द है । हिंदीमें इसके जैसा बूचा शब्द है जिसका अर्थ ' कानकटा हुआ ' ऐसा होता है । इन पटेलोंने राजाकी पालकीके अंग-प्रत्यंग काट डाले थे इस लिए इनको 'त्रूचा' कहा गया प्रतीत होता है । गुजरातीमें त्रूचाका अर्थ भोला-मूर्ख ऐसा भी होता है । इससे राजाने उनके इस भोलेपनको देख कर उन्हें 'त्रूचा' ऐसा सम्भाषण किया हो ।