प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश मनुष्योंको साथ ले कर, अकस्मात् उस देवीके मंदिरमें प्रादुर्भूत हुआ । उसने देवीकी रत्न, सुवर्ण और कर्पूरसे पूजा अर्ची की और उस राजाकी रानियोंको उसी प्रकारके उत्तम पानके बींड़े दिये । फिर श्री सिद्धराज का नामाङ्कित वह सिद्धदेव पूजाके बहाने वहीं रख कर, उसी बर्बरके कंधेपर चढ़कर, उड़ता हुआसा जैसे आया था वैसे ही चला गया । रातके अन्तमें रानियोंने उस तिरोवी राजाको यह वृत्तान्त कह सुनाया तो, भयभ्रान्त हो कर उसने, उस उपहारको, अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा सिद्धराज के पास पहुँचा दिया । इधर उस सेवकने अपने मालके क्रय-विक्रयका सङ्कोच करके शीघ्रगामी पुरुषके साथ यह खबर भिजवा दी कि-' जब तक मैं न आऊँ तब तक इन प्रधान पुरुषोंको दर्शन न दीजियेगा ।' फिर स्वयं जल्दी जल्दी चल कर कुछ ही दिनोंमें वहाँ पहुँच गया । उसके अपने कियेका पूरा वर्णन करने पर, राजाने उन प्रधानोंका यथोचित स्वागतादि किया । इस प्रकार यह कोल्हापुर प्रबंध समाप्त हुआ । * कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी । १२० ) श्री सिद्धराज, मालवमंडल से यशोवर्मा राजाको जब बाँध लाया, तब उसके निमित्त किये जाने वाले उत्सव पर सीलण नामक कौतुकीने कहा कि-' अहो बेडा ( नाव ) में समुद्र डूब गया ।' तब उसके पीछे स्थित किसी गायन ( गान करनेवाले ) ने ' तुम अपशब्द कह रहे हो '-ऐसा कह कर उसकी तर्जना की । तब उसने अर्थापत्तिसे इस प्रकार विरोधाऽलङ्कारका परिहार करके बताया कि-'बेटाके समान इस गूर्जर भूमिमें समुद्र जैसा यह मालव-नरेश डूब गया।' [इस पर उसने] राजासे सोनेकी जीभ प्राप्त की । इस प्रकार यह कौतुकी सीलणका प्रबंध समाप्त हुआ । * काशीपति जयचन्द्रकी सभामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता १२१) किसी समय, सिद्धराज के एक वाचाल सान्धिविग्रहिक (दूत) से काशी के राजा जय चंद्र ने अणहिल्लपुर के प्रासाद, प्रपा (बावड़ी) और निपान (कूप) आदिका स्वरूप पूछते समय [उसकी विशेष शोभा सुन कर, ईर्ष्यावश राजाने] यह दोष बताया कि-'सहस्रलिंग सरोवर का जल शिव-निर्माल्य होनेके कारण अस्पृश्य है। उसका सेवन करने वाले दोनों लोकसे विरुद्ध व्यवहार करते हैं । अतः वहाँके लोग, उदित प्रभाव वाले कैसे हों ? सिद्धराज ने सहस्रलिंग सरोवर बना कर यह अनुचित कार्य किया है।' राजाकी इस बातसे मन-ही-मन कुपित हो कर उसने राजासे पूछा कि-[आपकी] 'इस वाराणसी में कहाँका जल पिया जाता है ?' राजाके 'गंगाजल' ऐसा कहने पर उसने कहा-'क्या गंगाजल शिव निर्माल्य नहीं है तो और क्या है ? शिवका सिर ही तो गंगाकी निवास-भूमि है।' इस प्रकार जयचंद्र राजाके साथ गूर्जरके प्रधानकी उक्तिप्रत्युक्तिका प्रबंध समाप्त हुआ । * मयणल्लादेवीके पिताकी मृत्युवार्त्ता । १२२) किसी समय, कर्णाट देश से आये हुए सन्धिविग्रहिकसे मयणल्लादेवी ने अपने पिता जयकेशी का कुशल समाचार पूछा तो उसने अश्रुपूर्ण आँखोंसे कहा कि-' स्वामिनि, प्रख्यातनामा महाराज श्री जयकेशी भोजनके समय पिंजरेमे तोतेको युठा रहे थे। उसके 'मार्जार' (बिल्ली) बैठी है, ऐसा कहने पर, राजाने चारों ओर देख कर-किंतु अपने भोजनके पात्रके [चौकीके] नीचे छिपे हुए मार्जारको न देख कर-