प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश देवताके संकेतसे राज्याभिमानको छोड़ कर उसने कहा-‘जीव ! पधारिये !’ इस प्रकार विनयसे सिर नवाता हुआ हाथ जोड़ कर बोला कि ‘जो आज्ञा हो सो कहिये ।’ इसके बाद वहीं पर उसे यावज्जीवन मद्य-मांसके त्यागका नियम दिया और वहाँसे लौट कर वे दोनों क्षमापति (मुनि तो क्षमा=क्षान्तिके पति, राजा क्षमा= पृथ्वीके पति) अणहिल्लपुर आये । * कुमारपालका परमार्हत श्रावक बनना । १४३) श्री जिनमुखसे निस्स्रुत पवित्र वचनोंके श्रवण द्वारा प्रतिबुद्ध हो कर राजाने ‘परमार्हत’ विरुदको धारण किया । उससे अभ्यर्थित हो कर प्रभु (हेमचन्द्र)ने ‘त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित’ तथा बीस ‘वीतराग-स्तुतियों’ से युक्त पवित्र ‘योगशास्त्र’ की रचना की । उनका आदेश पा कर अपने आज्ञानुवर्ती अठारह देशोंमें, चौदह वर्ष तक, सर्व प्रकारकी जीव-हत्याका निवारण किया । [१२३] सतत आकाशमें विचरण करने वाले सप्तर्षिगण एक मृगीको भी व्याधोंके पाशसे मुक्त नहीं कर सके । परन्तु प्रभु श्री हेमसूरि अकेलेने ही चिरकाल तक पृथ्वी पर जीववध होनेका निषेध कर दिया । [१२४] [आकाश स्थित] कलाकलाप पूर्ण ऐसे चन्द्रमासे [पृथ्वी स्थित] हेमचन्द्र सूरि अधिक उज्ज्वलकीर्ति हैं । क्यों कि, चन्द्रमाने तो केवल एक ही मृगका [अपनी गोदमें ले कर] रक्षण किया है जब हेमचन्द्रने तो सब ही मृगोंका (सारे पशुगणका) रक्षण किया है । राजाने उन उन देशोंमें १४४० नये विहार (जैन मन्दिर) बनवाये । सम्यक्त्व मूलक १२ व्रतोंको अंगीकार किया । अदत्तादान-विरमण-स्वरूप तीसरे व्रतकी व्याख्या सुन कर रुदती (रोती हुई विधवा नारियोंके) धनका ग्रहण पापोंका कारण है ऐसा समझ कर, उस कामके अधिकारी पञ्चकुलों (कर्मचारी गण) को बुला कर उसके आयपत्रको, जिसका [वार्षिक] प्रमाण ७२ लाख था, फाड़ कर, उस करको बन्द कर दिया । उस करको छोड़ देने पर विद्वानोंने इस प्रकार स्तुति की— १८९. जिस रुदतीवित्तको, कृतयुगमें पैदा होनेवाले रघु-नहुष-नाभाग-भरत आदि जैसे राजा लोग भी छोड़ नहीं सके, उसे करुणावश हो कर मुक्त करने वाले कुमारपाल ! तुम महापुरुषोंके मुकुट-मणि हो । प्रभु हेमसूरिने भी इस तरह राजाका अनुमोदन किया कि— १९०. अपुत्र पुरुषोंका धन ग्रहण करके [अन्य] राजा तो पुत्र होता है । किन्तु सन्तोषपूर्वक उसका त्याग करने वाले तुम तो सचमुच राज-पितामह हो । * मंत्री उदयनका सौराष्ट्रके युद्धमें मारा जाना । १४५) फिर, सुराष्ट्र देशके सउसर [रात्तुर] से युद्ध करनेके लिये उदयन मन्त्री को दलका नायक बना कर सारी सेनाके साथ भेजा गया । वह वर्द्धमानपुर (आधुनिक वढवाण) में पहुँच कर [नजदीकहीमें रहे हुए शत्रुञ्जय पहाड़ पर] श्री युगादिदेवको नमस्कार करनेकी इच्छासे, समस्त मण्डले- श्वरोंको आगे चलनेकी अभ्यर्थना कर, खुद विमलगिरि (शत्रुञ्जय) आया । विशुद्ध श्रद्धाके साथ देव- चरणोंकी पूजा करके ज्यों ही विधिपूर्वक चैत्यवन्दना करने लगा, त्यों ही एक मूषक (चूहा) नक्षत्रमालासी प्रदीप्त दीपमालामेंसे एक दीपवर्तिका (दियेकी जलती हुई बाट) को ले कर काठके बने उस प्रासादके किसी बिलमें प्रवेश करने लगा, तो देवके अंगरक्षकोंने उसे छुड़ाया । इसे देख कर उस मंत्रीका समाधिभंग हो गया