प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 181 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ ] प्रबंधचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश मंत्री आम्रभटका शकुनिका विहारका उद्धार करवाना । १४६) इसके बाद, समस्त विश्वके एक अद्वितीय ऐसे सुभट आम्रभटने पिताके कल्याणार्थ भृगुपुर ( भरूच ) में शकुनिका विहार प्रासादके उद्धारका कार्य प्रारंभ किया । उसके लिये गहरी नींव खोदते समय, नर्मदा नदीके निकट होनेके कारण अकस्मात् वह नींव धस पड़ी और काम करने वाले मजदूर उसमें दब गये । उसने यह देख, कृपा-परवश हो कर, अपनी अत्यन्त निन्दा करते हुए, उसीमें अपने आपको भी गिरा दिया । इस अनुपम साहसके प्रभावसे वह विघ्न शान्त हो गया ( सब लोग बच गये ) । इसके बाद, शिलान्यासपूर्वक सारा प्रासाद तीन वर्षमें पूरा हुआ । कलश-दण्डकी प्रतिष्ठाका अवसर आने पर समस्त नगरोंके संघोंको निमन्त्रण दे कर बुलाया गया और उन सबको यथोचित वस्त्र और आभरण आदि दे कर सत्कृत किया गया और फिर सबको यथास्थान वापस पहुँचाया गया । लग्न समयके निकट आने पर भट्टारक श्री हेम- चन्द्रसूरिके नेतृत्वमें राजाके साथ अणहिल्लपुरके संघको निमंत्रित कर उसे अतुलित वस्त्रस्रगादि तथा भूषण आदि दानों द्वारा सन्तुष्ट करके, ध्वजारोहणके लिये घरसे चला । इस समय अपने सारे घरको मानों याचक- जनोंसे लुटना दिया । श्री सुव्रतदेवके प्रासादमे महाध्वजके साथ ध्वजारोपण करके, अत्यधिक हर्षके कारण, यह अनालस्य भावसे नाच करता रहा । अन्तमें राजाकी अभ्यर्थना पर, उसने आरती उतारी । अपना घोड़ा द्वारपालको दान कर दिया । राजाने स्वयं उसको तिलक किया । बहत्तर सामन्त चामर और पुष्प वर्षा आदिसे उत्साह बढ़ा रहे थे । उस समय आये हुए बंदीको अपना कंकण दे दिया । अन्तमें राजाने हाथ पकड़ कर जबर्दस्ती उसे बैठाया और आरती और मंगल प्रदीप उतरवाये । श्री सुव्रतदेवके तथा गुरुके चरणमें प्रणाम करके, बन्धुओंको वन्दना आदि करके, राजासे शीघ्र आरती उतरवानेका कारण पूछा। राजाने कहा - 'कि जैसे जुआडी अत्यधिक द्यूत-रसके आवेशमें अपने सिरको भी दाँव पर रख देता है, वैसे ही तुम भी इसके बाद कहीं अर्थियोंके माँगनेसे त्यागके आवेशमें आ कर अपना सिर भी उन्हें न दे डालो' । राजाके इस प्रकार कह चुकने पर, उसके लोकोत्तर चरित्रसे हृत-हृदय हो कर श्रीहेमाचार्यने भी, जिन्होंने जन्मकालसे ही किसी मनुष्यकी स्तुति नही की थी, कहा - १९२. उस कृतयुगसे [ हमें ] क्या [ मतलब ] है जिसमें तुम नहीं थे । और जिसमें तुम [ विद्यमान ] हो वह कलि कैसा । और यदि कलिहीमें तुम्हारा जन्म होता है तो वह कलि ही सदा रहो - कृतसे क्या मतलब है । इस प्रकार आम्रभटकी अनुमोदना करके दोनों क्षमापति, जैसे आये थे वैसे ही वापस गये । * आम्रभटका शाकिनीग्रस्त होना । १४७) इसके बाद, जब हेमचंद्र अपने स्थान पर पहुँचे तो उन्हें यह विज्ञप्ति मिली कि आकस्मिक रीतिसे देवी ( शाकिनी ) के दोषसे ग्रस्त हो कर आम्रभटकी अन्तिम दशा उपस्थित हो गई है और आपको शीघ्र बुलाया गया है । उन्होंने तत्काल ही समझ लिया कि 'यह महामना जब प्रासादके शिखर पर नृत्य कर रहा था उसी समय मिथ्यादृष्टि देवियोग कुछ दोष उसे हुआ है।' यह सोच कर, सायंकाल ही को तपोधन यशश्चन्द्रको साथ ले, आकाशगामिनी शक्तिसे उड़ कर निमेषमात्रमें, भृगुपुरकी प्रान्तभूमिको अलंकृत किया और सैन्धवा देवीका अनुनय करनेके लिये कायोत्सर्ग किया । उस देवीने जीभ निकाल कर उनका अपमान किया । तब उत्तरमें शाण्डि-धारक डाउ कर यशश्चन्द्र गणिने मुखाग्रसे प्रहार करना शुरू किया । पहली बारके प्रहारमें प्रासाद काँपने लगा, दूसरी बार प्रहार देने पर वह देवी ही अपने स्थानसे उखड़ कर - 'इम यश-