भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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है । हमने इस पर कहा कि 'क्या अब भी ?' यह कहते ही शब्दतत्त्वको जानने वाले इसने कहा कि 'अब तो नहीं।' क्यों कि पहले मातृका-शास्त्र (वर्णमाला) में हकार सबके अंतमें पढ़ा जाता था, अतएव यह रडता=रोता था; 'किन्तु अब तो मेरे नाम (हेमचंद्र) में यह पहले आ गया है और एक मात्रा अधिक भी हो गया है। इस प्रकार यह हरदइ प्रबंध समाप्त हुआ। * उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति। १५२) एक बार, किसी पंडितने पूछा कि 'उर्वशी' शब्दका शकार तालव्य है या दन्त्य। इस पर प्रभु (हेमचंद्र) कुछ सोच कर कहने जा रहे थे कि कपर्दीने पत्र पर यह लिख कर उनके अंकमें फेंक दिया कि 'उरौ शेते उर्वशी' अर्थात् जो उरुमें शयन करे वह उर्वशी। इसीको प्रामाण्य समझ कर प्रभुने उस पंडितके आगे तालव्य शकार होनेका निर्णय कह सुनाया। इस प्रकार यह उर्वशी-शब्द-प्रबंध समाप्त हुआ। * सपादलक्षके राजाके नामका अर्थखण्डन। १५३) अन्य किसी समय, सपादलक्षके राजाका कोई सान्धिविग्रहिक कुमारपाल राजाकी सभामें आया। राजाने पूछा कि 'आपके स्वामी कुशल तो हैं?' अपनेको महापंडित समझने वाला वह मिथ्याभिमानी बोला- 'विश्वको जो ले ले वह 'विग्लछ' कहलाता है (-यह सपादलक्षके राजाका नाम था)। इस लिए उसकी विजयमें क्या सन्देह है?' राजाका इशारा पा कर श्रीमान् कपर्दी मंत्रीने कहा कि- 'श्ल-श्लछ धातु सो शीघ्र गत्यर्थक है। इसी श्लछ धातुसे यह शब्द बना है, अतः इसका अर्थ तो यह हुआ कि-वि अर्थात् पक्षीकी भाँति जो श्लठन करता है - भाग जाता है वह 'विग्लछ' है।' इसके बाद, उस प्रधानके द्वारा इस नाममें दोष समझ कर उस राजाने पंडितोंके पास निर्णय कराके 'विग्रहराज' ऐसा दूसरा नाम धारण किया। दूसरे वर्ष उसी प्रधानने कुमारपाल नृपतिके सामने 'विग्रहराज' यह नाम बताया। मंत्री कपर्दीने [ यह अर्थ किया]-विग्र=विगतनासिक-नासिकाहीन; ह-राज अर्थात् रुद्र और नारायण। रुद्र और नारायणको जिसने नासिका हीन किया है यह इस 'विग्रहराज' का अर्थ है। तदनन्तर कपर्दी के नामखण्डनके भयसे उस राजाने 'कवि-बान्धव' ऐसा नाम धारण किया। * १५४) एक दूसरी बार, कुमारपाल राजाके आगे योग शास्त्र का व्याख्यान हो रहा था उसमें जब पञ्चदश कर्मादानका पाठ पढा जाने लगा तब "दन्तकेशनखास्थित्वग्रोम्णां ग्रहणमाकरे" प्रभुके रचे हुए इस मूल पाठमें पडित उदयचन्द्र बार बार 'रोम्णा ग्रहणम् रोम्णा ग्रहणम्' यह पाठ बोलने लगा। तो प्रभुने पूछा कि - 'क्या लिपि-भेद (अशुद्ध पाठ) हो गया है?'। उसने कहा- 'प्राणितूर्याङ्गानाम्' इस व्याकरण सूत्रसे तो एकत्व सिद्ध होता है, [सो यहाँ पर वैसा होना चाहिए]' ऐसे लक्षणविशेषको बता कर, प्रभु द्वारा प्रशंसित हुआ और राजाने न्युंछन करके उसकी संभवाना की। इस प्रकार पं० उदयचंद्रका यह प्रबंध समाप्त हुआ। *