भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 181 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

'प्रकरण १६३-१६५] कुमारपालादि प्रबन्ध । [ ११३ कुमारपालका तीर्थयात्रा करना । १६४) एक बार, राजा श्री कुमारपालने संङ्घाधिपति हो कर तीर्थयात्राके लिये महोत्सवपूर्वक संघ निकालना निश्चित किया और उसके देवालयका प्रस्थान-मुहूर्त साधित किया । इतनेमें देशान्तरसे आये हुए चर युगलने कहा कि- 'डाहल देशका राजा कर्ण आप पर चढ़ाई करके आ रहा है ।' [ इसको सुन कर ] राजाके ललाट देश पर [ पसीनेके ] स्वेद बिंदु झलकने लगे । संघाधिपत्यके पदकी प्राप्तिका मनोरथ नष्ट हो जानेके भयसे वाग्भट मंत्रीके साथ आ कर प्रभुके चरणों पर गिर पड़ा और अपनी निंदा करने लगा । राजाके आगे इस प्रकार महाभयका उपस्थित होना जान कर, प्रभुने कुछ सोच कर कहा कि- 'बारह पहरमें ही इस भयकी निवृत्ति हो जायगी [ इस लिये कुछ चिन्ता न करो ] । राजा विह्वल हो कर, किं- कर्तव्यविमूढ़सा बना हुआ ज्यो ही बैठा था त्यों ही निर्णीत समय पर आये हुए दूसरे चरयुगलने समाचार दिया कि-' श्री कर्ण राज का [ अकस्मात् ] स्वर्गवास हो गया ।' राजाने मुँहसे पानका त्याग करते हुए पूछा- 'सो कैसे ?' उन्होंने कहा- 'हाथीके होदे पर बैठ कर राजा कर्ण रातको प्रवास कर रहा था तब उसकी नींदसे आँखें बन्द हो गईं । गलेमें लटकता हुआ सोनेका हार एक बरगदके दरख्तकी डालीमें उलझ गया और उससे खींचा जा कर राजा मर गया । हम दोनों उसके अग्निसंस्कारके अनन्तर वहाँसे चले हैं । उनके ऐसा कहने पर, राजा तत्काल पौषधशालामें आया और सूरिकी अत्यन्त ही प्रशंसा करने लगा जिसको किसी तरह उन्होंने रोका । फिर, ७२ सामंत और संपूर्ण संघके साथ, प्रभुके बताये हुए [ धर्म और प्रवासके ] दोनों प्रकारके मार्गसे धुन्धुकनगरमें आया । वहाँ पर प्रभुके जन्मस्थानमें स्वयं बनाये हुए १७ हाथ ऊँचे झोलिका विहारमें उत्सवादिका विधान करने पर जातिपिशुन ब्राह्मणोंने विघ्न किया तो, उन्हें देश निकाला दिया गया और फिर शत्रुंजय की उपासना की । वहाँ 'दुक्खखओ कम्मक्खओ' (दुःखक्षयः, कर्मक्षयः) इस प्रकारके प्रणिधान दण्डक ( सूत्रपाठ ) का उच्चारण करता हुआ देवके पास विविध प्रार्थना करनेके अवसर पर किसी चारणके मुँहसे यह कथन सुना - २०४. अहो यह जिनदेवका कितना भोलापन है। जो एक फलके बदलेमें मुक्तिका सुख दे देता है। इसके साथ किस बातका सौदा किया जाय । उसके नौ बार इस दोहेके पढ़ने पर, राजाने उसे नौ हजारका दान किया । इसके बाद जब यह उज्जयन्त ( गिरनार ) के पास आया तो अकस्मात् पर्वतमें कंप हुआ देखा । तब श्री हेमाचार्यने राजासे कहा-' वृद्धोंकी यह परंपरागत बात है कि, एक ही साथ दो पुण्यवन्त पुरुष इस पर चढ़ते हैं तो यह छत्रशिला गिर पडती है। यदि यह बात कहीं सत्य हो तो लोकापवाद होगा, क्यों कि हम दोनों ही [ एकसे ] पुण्यवान् हैं। इस लिये आप ही [ पर्वत पर ] नमस्कार करने जाँय, हम नहीं ।' पर राजाने आग्रह करके प्रभुको ही संघके सहित ऊपर भेजा । स्वयं नहीं गया । श्री वाग्भटदेव को छत्रशिलाके उस रास्तेको छोड़ कर जीर्ण प्राकार ( जूना गढ़ ) के रास्तेसे नई पथा ( पत्थरकी सीढ़ी ) बनवानेके लिये आदेश दिया । पथाके बनानेमें ६३ लाख दाम लगे । इस प्रकार तीर्थयात्रामबंध समाप्त हुआ । * कुमारपालका स्वर्णसिद्धिकी प्राप्तिकी इच्छा करना । १६५) एक बार, पृथ्वीको अऋण करनेकी इच्छासे, राजाने स्वर्णसिद्धिकी प्राप्तिके लिये श्री हेमचंद्राचार्य के उपदेशसे उनके गुरु श्री देवचन्द्राचार्यको, श्री संघ और राजाकी विज्ञप्ति भिजवा कर यहां बुलवाये । वे २९-३०