प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण १६९-१७५ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ ११७ [ १३२ ] इसने लड़ाईमें तो वीरोंके भी सामने अपने पैर उठाये, पर उनकी स्त्रियोंके सामने तो वह अपना मुख ही नीचा कर लेता था । [ १३३ ] हृदय ( छाती ) में लगे हुए जिसके बाणसे क्लान्त हो कर, जाँगलके राजाने तो अपना सिर घुमाया ही पर उसकी प्रशंसा करने वालों दूसरोंने भी अपना सिर घूमाया । [ १३४ ] कौङ्कण देश का नरेश, जो मारे गर्वके रत्नमय मुकुटकी प्रभासे चरुचकित ऐसे अपने सिरको न नवाना चाहा तो इस राजाने अपने बाणोंसे उसके सिरको टुकड़े टुकड़ेकर दिया । [ १३५ ] रागवश हो कर जिस राजाने युद्धमें बल्लाल और मल्लिकार्जुन राजाओंके सिरोंको, जयश्रीके दोनों कुचोंकी तरह ग्रहण किया । [ १३६ ] जिस राजाने दक्षिण देशके राजाको जीत कर उससे दो द्विप (हाथी) ग्रहण किये । मानों वे इस लिये कि उसके यशसे हम इस विश्वको नष्ट-विपद् बनायेंगे । [ १३७ ] शत्रुओंकी पत्नियोंके कुचमण्डलको त्रिहार (त्रिगत हार) बनाते हुए जिस राजाने मही- मण्डलको उद्दण्डविहार (जैनमन्दिर) वाला बनाया । [ १३८ ] जिसने पादलग्न महीपालों और तृणको मुंहमें दबाने वाले पशुओंके द्वारा मानों प्रार्थित हो कर ही उत्तम अहिंसा व्रतको ग्रहण किया । १७३) सं० ११९९ से [ १२३० तक ] ३१ वर्ष तक श्री कुमार पाल ने राज्य किया । * अजयपालका राज्याभिषेक । १७४) सं० १२३० वर्षमें अजय देव का राज्याभिषेक हुआ । (इस राजाके वर्णनके कुछ विशिष्ट श्लोक भी P आदर्शमें इस प्रकार पाये जाते हैं-) [ १३९ ] इस [कुमारपाल] के बाद कल्पद्रुमके समान अजयपाल नामक राजा हुआ जिसने वसुन्धराको सोनेसे भर दिया । [ १४० ] जिसने जाँगल देश (के राजा) के गले पर पैर रख कर उससे दण्डमें सोनेकी मण्डपिका (माँडवी=पालकी जैसी) और कई मत्त हाथी ग्रहण किया । [ १४१ ] उद्दाम तेजसे सूर्यकी भी भर्त्सना करने वाले जिस राजाने, परशुरामकी तरह, क्षत्रियोंके रक्तसे धोई हुई पृथ्वीको श्रोत्रियोंकी रक्षाका पात्र बनाया । [ १४२ ] जिस राजाके तीनों गण (=धर्म, अर्थ, काम) नित्यदान देनेसे, नित्य राजाओंको दण्ड देनेसे और नित्य स्त्रियोंसे विगाह करनेसे, समान हो कर रहे । [ १४३ ] राजाओंके नेपथ्यको धारण करने वाले [उस राज्य नाटकमें] शतक्रतु (इंद्र) [का अभिनय करने वाले इस राजा] के चले जाने (मर जाने) पर इसके पुत्र मूलराजने जयन्तका अभिनय किया । * अजयपालका जैन मन्दिरोंका नाश करना । १७५) यह अजय देव जब पूर्वजोंके बनाये मंदिरोंको तुड़ाने लगा तो सीहण नामक कौतुकी, राजाके सामने नाटकका प्रसंग उपस्थित कर, उसमें, अपनेको कृत्रिम रोगी कल्पित कर, तृणके बने हुए पाँच