भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण १८७ ] कुमारपालादि प्रबन्ध । [ १२३ [ १५८ ] जिसने यहाँ पर ( स्तंभतीर्थमें ) भवसागरको पार करनेके लिये नौकारूप ब्रह्मपुरी बनवाई जिसमें पुरुष तो सामगान करते थे और नारियाँ उसका यशोगान करती थीं । [ १५९ ] अपने शुभ्र ऐसे कीर्तिकूट रूप पटसे, दसों दिशाओंका वेष्टन करते हुए स्पष्ट रूपसे, इसने मानों दसों दिशाओंको श्वेताम्बर व्रती बनाया । [ १६० ] जिस तारितात्माने ऐसी पौषधशालायें बनाईं जो भीतरसे तो श्वेताम्बरोंसे ( श्वेताम्बर यतियोंके निवाससे ) और बाहर सुधा ( चूनापोती ) से विशुद्ध थीं । [ १६१ ] जिसकी पौषधशालाओंमें स्त्रीरहित ऐसे यति वास करते हैं जिनको आत्मभू ( पुनर्जन्म तथा पुनर्जन्म ) की कोई संभावना ही नहीं है । [ १६२ ] वाग्देवीने प्रसन्नतापूर्वक जिस मंत्रीको ज्ञानकी ऐसी आंख दी थी कि जिससे यह धर्मकी सूक्ष्म गतिको भी नित्य ही देखा करता था । वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन । १८७) इसके बाद, सं० १२७७ सालमें सरस्वतीकण्ठाभरण, लघुभोजराज, महाकवि, महाऽमात्य श्री वस्तुपालने महायात्रा प्रारंभ की । गुरुके बताये हुए लग्नमें, उन्हींके द्वारा संघाधिपति रूपसे अभिषिक्त हो कर वह जब देवालयके प्रस्थानका उपक्रम कर रहा था, तब दाहिनी ओरसे दुर्गादेवीका स्वर सुनाई दिया, जिसे स्वयं बुद्ध समझ कर, शकुन शास्त्रके जानकारसे उसका विचार पूछा । मरुदेशके एक वृद्ध ( शाकुनिक ) ने कहा कि ' शकुन तो बड़ा भारी हुआ है ' । ' शकुनसे भी शब्द बलवान् होता है ' यह विचार करके नगरके बाहर आवास ( तंबू ) में देवालयको स्थापित किया । फिर उससे शकुनका विचार पूछने पर उस वृद्धने बताया कि, मार्गकी विषमतामें विपरीत शकुन श्रेष्ठ कहा जाता है । [ वर्तमानमें ] राजकीय अन्धाधुन्दीके कारण तीर्थ यात्राका मार्ग विषम हो रहा है । तथा जहां पर यह दुर्गा देख पड़ी थी, वहाँ किसी चतुर पुरुषको भेज कर उस प्रदेशको दिखलाइये । वैसा ही करने पर उस पुरुषने बताया कि-' यह जो बडी (बाडेकी भींत) नई बनाई जा रही है उसके १३॥ हवे थर पर यह दुर्गा बैठी थी ।' यह सुन कर उस मरुवृद्धने कहा कि-' देवी आपको साढी तेरह यात्रा करनेकी सूचना करती है।' अंतिम आधी यात्राका कारण पूछने पर उसने कहा कि-' इस अतुलनीय मगलके अवसर पर यह कहना ठीक नहीं है । यथा समय सब निवेदन करूँगा ।' इस वाक्यके अनन्तर संघके साथ मंत्रीने आगे प्रयाण किया । उस संघकी सब संख्या यों थी- ४॥ हजार वाहन, २१ सौ श्वेताम्बर, तीन सौ दिगम्बर, संघकी रक्षाके लिये १ हजार घोड़े, सात सौ ढाल सांडानिया और संघरक्षाके अधिकारी चार महासामन्त थे। इस प्रकार सारी सामग्रीके साथ मार्ग तै करके, श्रीपादलिप्तपुरके अपने ही बनाये हुए श्रीमन् महावीर देवके चैत्यसे अलंकृत ललिता सरोवरके मैदानमें डेरा दिया। उस तीर्थ पर यथाविधि तीर्थराधना करके मूल प्रासादमें सोनेका कलश, दो प्रौढ़ जिन मूर्तियाँ, श्री मोढेरपुरावतार श्री मन्म- हावीर चैत्य तथा उसके आराधक (यक्ष) की मूर्ति और देवकुलिका, मूल मण्डपके दोनों ओर दो दो चौकीकी कतार, शकुनिका विहार तथा सयपुरावतार चैत्यके सामने चौंरीके तोरण, श्रीसंघके योग्य कई मठ, सात बहनोंकी ७ देव कुलिकायें, नन्दीश्वरावतार-प्रासाद, इन्द्र मण्डप और उसमें हाथी पर चढ़े हुए लवण प्रसाद और वीरधवल की मूर्तियाँ, वहीं पर घोड़े पर चढ़ी सात पूर्वजोंकी मूर्तियाँ, सात गुरुमूर्तियाँ, उसीके निकटकी चौकीमें अपने दो बड़े भाई महं० मालदेव और लूनिग की आराधक मूर्तियाँ, प्रतोली, अनुगमा सरोवर, कपर्दि यक्ष-मण्डप और तोरण आदि बहुतसे धर्मस्थान बनवाये । इसी तरह नन्दीश्वरके कमठाने ( कारखाने ) के लिये कंटेठिया

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