प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश [ १६६ ] जहाँ लक्ष्मी है वहाँ सरस्वती नहीं है, जहाँ ये दोनों हैं वहाँ विनय नहीं है । पर हे यशोवीर, यह बड़ा आश्चर्य है कि तुममें ये तीनों विद्यमान हैं । [ १६७ ] वस्तुपाल और यशोवीर ये दोनों सचमुच ही वाग्देवता ( सरस्वती ) के पुत्र हैं, नहीं तो फिर इन दोनोंका दान करनेमें एक ही जैसा स्वभाव कैसे होता । इस प्रकार श्री शत्रुंजयादि तीर्थोंकी यात्राका प्रबंध समाप्त हुआ । * वस्तुपालका शंखराजके साथ युद्ध करना । [८९] स्तंभतीर्थमें, सइद ( सय्यद ) नामक नौवित्तक ( जहाजी व्यापारी ) से श्रीवस्तुपाल की लड़ाई होने पर उसने भृगुपुर से शंख नामक महासाधनिकको वस्तुपाल के विरुद्ध वाठरूप फालको उठाया । वह समुद्रके किनारे डेरा डाल कर रहा । उसने देखा कि नगरका प्रवेशमार्ग शंकुसे ( जन समूहसे ) संकीर्ण है और व्यापारियोंके जहाज धनसे भरे हुए हैं । अपने बंदी ( दूत ) को भेज कर वस्तुपालके साथ लड़ाईके दिनका निश्चय किया । जब उसने चतुरंग सेना सजाई तो वस्तुपालने गूड जातिके भूर्णपाल नामक सुभटको आगे किया । भूणपाल ने प्रतिज्ञा की कि- 'शंख के सिवा यदि दूसरे पर प्रहार करूं तो मैं उसे कपिला गौपर ही प्रहार करना मानूंगा' । फिर बोला कि 'अरे शंख कौन है ?' इस वचनके उत्तरमें प्रतिभट ( शत्रुके सैनिक ) ने कहा कि 'मैं शंख हूं' तो उसे तलवारकी धारसे मार गिराया; फिर इसी रीतिसे दूसरे और तीसरेको भी गिरा देनेके बाद बोला कि- 'समुद्रके नजदीक होनेसे क्या शंखोंकी संख्या बढ़ गई है ?' तो महासाधनिक शंखने ही उसकी सुभटताकी प्रशंसा करते हुए बुलाया । उसने फिर भालेके अग्रभागसे उस पर प्रहार करते हुए एक ही प्रहारमें घोड़ेके साथ उसे मार डाला । इसके बाद, समरभूमिके प्रेमी श्रीवस्तुपालने, सिंहकिशोर जैसे गजयूथको त्रस्त करता है वैसे, शंखके सैन्यको त्रस्त बना कर दसों दिशाओंमें भगा दिया । [ पीछे सइद नौवित्तक भी मार डाला गया ।] फिर भूणपाल की मृत्युके स्थान पर मंत्रीने भूणपालेश्वर प्रासाद बनवाया । ( यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [ १६८ ] धनुषकी प्रत्यञ्चासे काण्डों ( बाणों ) की तो सन्धि ( सुलह और योग ) हुई पर उन वीरप्रकाण्डोंमें परस्पर विग्रह हुआ । [ १६९ ] बाणोंने स्पष्ट ही दुर्जनोंकी सी चेष्टा की । क्यों कि ये कानमें तो दूसरेके लगते थे और जीवननाश दूसरेका करते थे । [ १७० ] तरकसको छोड़ कर बाण वेगसे धनुष पर आ जाते थे । यही तो सपक्षोंका ( १ अपने पक्षवालोंका, २ पक्षसहितों - बाणोंका ) चिह्न है कि विपत्कालमें आगे रहते हैं । [ १७१ ] विपक्षीय बैरियोंके वक्षःस्थलमें लग कर बाण पार निकल गये । [ सो ठीक ही है ] क्यों कि धीरोंके हृदयमें निर्गुणोंको थिर अवस्थान नहीं प्राप्त होता । [ १७२ ] मंत्रीशके हाथके संसर्गसे तलवार भी मानो दानके लिये उद्यत हो कर, बद्धमुष्टि होते हुए भी, क्षण भरमें कोश ( १ म्यान, २ खजाना ) का उत्सर्ग ( १ त्याग, २ दान ) किया । [ १७३ ] वीरोंके चरण और हाथ रूपी कमलसे पूजित हो कर रणभूमि भी मानों दूर्वारूपी केशोंके साथ सिररूपी फलोंका दान करने लगी । *