प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण २००-२०३ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध । [ १३३ गुरुने उसे सूरिपद दिया । तबसे उनका नाम हुआ श्री मल्लवादी सूरि । गणभृतके समान वे प्रभावक हुए । अतएव श्री संघने, नवाङ्गवृत्तिकार श्री अभयदेव सूरिने जिसको प्रकट किया उस स्तम्भनक तीर्थकी निशेष उन्नतिके लिये, उनको चिन्तायक ( व्यवस्थापक ) रूपमें नियुक्त किया। इस प्रकार यह मल्लवादि प्रबंध समाप्त हुआ। * वलभी नगरीके विनाशकी कथा । २०२) मरुमण्डलके पल्लीग्राममें काकू और पाताक नामक दो भाई रहते थे । उनमें जो छोटा था वह धनवान् था और जेठा उसीके घर नौकर था। किसी समय, वर्षा ऋतुके निशीथ कालमें, दिनभरमें किये हुए कामसे थक कर काकू सोया हुआ था । छोटेने कहा - 'भैया, अपनी [खेतकी] क्यारियोंमें पानी भर गया है, उनकी मेंड टूट गई है और तुम निश्चिंत बैठे हो' यह कह कर उसे फटकारा । वह उसी समय, बिछौना छोड़ कर और कंधेपर कुदाल रख कर, अपने नसीबकी निंदा करता हुआ जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि कई मजदूर टूटी हुई मेंडोंकी मरम्मत कर रहे हैं। उन्हें ऐसा करते देख उसने पूछा कि 'तुम लोग कौन हो ?' उन्होंने कहा कि 'आपके भाईके चाकर हैं।' इसपर उसने पूछा कि 'भला मेरे भी कोई चाकर कहीं है ?' तो उन्होंने कहा कि 'वलभी नगरी में हैं।' यह फिर अवसर पा कर अपने सर्वस्वको गट्ठड़में बाँध कर, उसे सिरपर उठा कर, वलभी में आया। वहाँ सदर दरवाजेके समीपवर्ती अमीरोंके पास निवास करने लगा। उन्होंने अत्यन्त गरीब समझ कर उसे 'रंक' कहना शुरू किया। रंक घासकी झोंपड़ी बना कर, और घासहीसे उसे छा कर रहने लगा। उसी समय कोई कार्पटिक (जोगी) कन्थ-पुस्तकके आदरसे, रैवत शैलसे एक तूंबेमें सिद्धरस ले कर, मार्ग अतिक्रम करता हुआ [चला आ रहा था। अचानक] उस तूंबेमेंसे 'काकस्य तुम्बडी' (काकूकी तुम्बड़ी) इस प्रकारकी अशरीरिणी वाणी हुई; जिसे सुन कर वह बड़ा विस्मित हुआ; और फिर डरता हुआ उस छिपे हुए बनियेके घरमें, यह सुन कर कि वह एक रक है, निश्शङ्क-भावसे उस रसवाले तूंबेको थातीके रूपमें रख दिया। वहाँसे वह सोमेश्वरकी यात्राके लिये चला गया। एक दिन [रंकने] किसी पर्वके अवसरपर देखा कि, पाक करनेके लिये चूल्हेपर चढ़ाई हुई कड़ाहीमें, तूंबेसे निकले हुए रसके गिरनेसे वह सोनेकी हो गई है। इससे उस बनियेने मनमें निर्णय किया कि यह सिद्धरस है। तब उसने उस तूंबेके साथ अपने घरका सब कुछ सामान अन्यत्र पहुँचा कर घरको आग लगा कर भस्म कर दिया। नगरके दूसरे दरवाजेपर बड़ा मकान बनवा कर वहीं रहने लगा। एक बार, किसी घी बेंचनेवालीसे घी खरीद रहा था। खुद ही तौल करते हुए उसने देखा कि उसमेंसे घी खूटता ही नहीं है। नीचे देखा तो घीके पात्रके नीचे वृद्धचित्रक [लता] की कुण्डलिया नज़र आई। फिर किसी प्रकार छल करके उसे उठा लिया और इस प्रकार उसे चित्रकसिद्धि प्राप्त हो गई। इसी तरह अगणित पुण्यके प्रभावसे उसे सुवर्णपुरुषकी सिद्धि भी प्राप्त हुई। इस प्रकार तीनों प्रकारकी सिद्धिसे कोटि-कोटि संख्या धन एकत्र करके भी, उसने अत्यन्त कृपणतावश, किसी सत्पात्र या तीर्थमें उदारता पूर्वक उसका खर्च करना तो दूर रहा, बल्कि सब लोगोंके सर्वस्वके हरण करनेकी इच्छासे, उस लक्ष्मीको सकल विश्वके लिये कालरात्रिके समान प्रकट किया। २०३) ऐसेमें, राजाने अपनी लड़कीके लिये, उसकी लड़कीकी रत्नखचित सुवर्णकी कंघीको जबर्दस्ती उससे छिनवा ली। इससे विरोधी हो कर वह स्वयं म्लेच्छ मण्डलमें गया और वलभीके राज्यका नाश करानेके लिये, करोडोंका सोना दे कर, वहाँके बलवान् राजाको देशपर चढ़ा लाया। उस (रंक) के द्वारा अनुस्यूत, उस राजाके एक छत्रधरने, रात्रिके शेष भागमें, जब कि राजा सुप्त-जाग्रत अवस्थामें था, पहलेसे ही ठीक किये हुए,