भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

च ] प्रबन्धचिन्तामणि मिलते हैं। इस पिछले प्रकारके पद्योंको हमने पीछेसे लिखे गये अर्थात् प्रक्षिप्त माना है; और बाकीको मौलिक। इन दोनों तरहके पद्योंके लिये हमने दो प्रकारके क्रमांक दिये हैं। जो मौलिक हैं वे ‘१. २. ३.’ इस प्रकारके चालू अंकोंसे सूचित किये गये हैं और जो प्रक्षिप्त हैं वे ‘[१]-[२]-[३]’ इस प्रकार चौकोनी डबल ब्रेकेटवाले अंकोंसे बताये गये हैं। पद्योंकी तरह, मूल ग्रन्थमें, कुछ गद्य प्रकरण कण्डिकायें भी प्रक्षिप्त हैं, जिनको हमने अपनी उस मूलावृत्तिमें तो जुदा तरहके टाईपोंमें और { } ऐसे अथवा [ ] ऐसे ब्रैकेटोंके बीचमें मुद्रित कीं हैं। यहाँ, इस भाषान्तरमें वे कण्डिकायें जुदा टाईपोंमें न छाप कर, सिर्फ उनके ऊपर, ब्लैक टाईपमें ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें, अथवा चालू टाईपमें [ ] ऐसे चौकोनी ब्रैकेटमें, उसकी ज्ञापक पंक्तियाँ लिख कर, उल्लिखित कर दी हैं। (—देखो, पृष्ठ १६, २०, ४८, ४९ इत्यादि ।) । इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ, जो प्रसङ्गोचित पद्य उद्धृत किये गये हैं उनमेंसे कुछ तो ऐतिहासिक घटना बताने- वाले हैं और कुछ सुभाषित स्वरूप हैं। इनमेंके कुछ पद्य द्विअर्थी अर्थात् श्लेषार्थक हैं जिनका स्वारस्य संस्कृत या प्राकृत भाषा-ही में ठीक आस्वादित हो सकता है। हिन्दीमें उसका अर्थ ठीक अनूदित नहीं हो पाता। ऐसे पद्योंके अर्थके विषयमें जहाँ तक हो सका, तदन्तर्गत मुख्य भावार्थ बतलानेका ही प्रयत्न किया गया है। कोई कोई पद्य ऐसे भी दुरवबोध मालूम देते हैं जिनका तात्पर्य ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे स्थानोंमें जो अर्थ दिये गये हैं वे शङ्कित ही समझे जायें—जैसा कि पृ. ७७ आदि पर सूचित किया गया है। कहीं कहीं गद्य कथनमें भी ऐसी दुरवबोधता और अस्पष्टार्थता प्रतीत होती है और उसका ठीक ठीक तात्पर्य नहीं जाना जा सकता—जैसा कि पृ. ९४ परकी टिप्पणीमें सूचित किया गया है। ग्रन्थकारने कहीं कहीं ऐसे अपरिचित शब्दोंका प्रयोग किया है जो शुद्ध संस्कृतके न होकर देश्य भाषाके हैं और जिनका अर्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे शब्दोंके दिये गये अर्थ भी सर्वथा निर्भ्रान्त नहीं कहे जा सकते। इन सब शङ्कित स्थानों और अर्थोंके विषयमें पाठक हमें कोई दोष न दें ऐसी विज्ञप्ति है। जब यह भाषांतर छपाना शुरू किया गया तब हमारी इच्छा थी, कि हम इसके साथ, इस ग्रन्थमें वर्णित विशेष विशेष ऐतिहासिक और भौगोलिक नामोंके बारेमें, अन्यान्य साधनोंद्वारा उपलब्ध या ज्ञात बातोंका परिचय करानेवाली विस्तृत टिप्पणियाँ दें, और इसमें जो कुछ पारिभाषिक शब्दसमूह और लोकोक्तिरूप वाक्य-विन्यास उपलब्ध होते हैं उनको स्फुट करनेवाली व्याख्यात्मक पंक्तियाँ भी लिखें। किन्तु, जब हमने कुछ ऐसी टिप्प- णियाँ और पंक्तियाँ लिखनीं प्रारंभ कीं तो उनका कलेवर इतना बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा जो मूल ग्रन्थसे भी कहीं अधिक बढ़ जानेकी आशङ्का कराने लगा। और ये सब टिप्पणियाँ लिखनेका तो हमारा उत्कट लोभ है। क्यों कि इन्हीं टिप्पणियों द्वारा तो इस ग्रन्थका सारा महत्त्व प्रकट होनेवाला है। इसलिये फिर हमने यह विचार किया कि इन टिप्पणियों आदिका सङ्कलनवाला एक पर्यालोचनात्मक पूरा भाग ही अलग निकाला जाय, जिससे भाषान्तरवाला यह भाग अनपेक्षित रूपसे विस्तृत न हो, और जिनको केवल प्रबन्धचिन्तामणिका मूलगत ग्रन्थसार मात्र ही पढ़ना-समझना अपेक्षित हो उनको इसके पढ़नेमें कोई कठिनता प्रतीत न हो। इसीलिये हमने पृष्ठ २, ११, १८ आदि पर जो टिप्पणियाँ दी हैं उनमें यह सूचित कर दिया है कि इन बातोंका विशेष विवेचन या ऊहापोह इसके अगले भागमें किया जायगा—इत्यादि। यह अगला भाग, पुरातनप्रबन्धसंग्रह नामक, मूल ग्रन्थके पूरकात्मक द्वितीय भागके, इसी तरहके