प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर लेनेमें कोई संकोच नहीं किया। भोज-भीमप्रबन्धकी बहुतसी स्मृतियाँ इसी दृष्टिसे संगृहीत की गई हैं। सिद्धराजके प्रबन्धमेंकी भी बहुतसी बातें इसी आशयसे लिखी गई हैं। * ९. मेरुतुङ्ग सूरिकी इतिहास-प्रियता। मालूम देता है कि मेरुतुङ्ग सूरिको ऐतिहासिक बातोंमें कुछ अधिक रस था और ऐतिहासिक तथ्यपर पक्षपात था। इसलिये उन्होंने सिद्धराज और कुमारपालके जीवन विषयकी वैसी भी कुछ तथ्यभूत बातें उल्लिखित कर दी हैं जिससे उन व्यक्तियोंके, कुछ चरित्र दुर्बलता और स्वभाव-कृपणता आदि दोषोंकी भी, हमको झांकी हो जाती है। हेमचन्द्र सूरि आदि विद्वानोंने अपनी रचनाओंमें ऐसे दोषोंका बिल्कुल भी आभास नहीं आने दिया है। * इस विषयमें, मेरुतुङ्ग सूरिने सबसे अधिक महत्त्वकी जो सत्य ऐतिहासिक बात लिख डाली है वह है मन्त्रीवर वस्तुपाल-तेजपालकी माता कुमारदेवीके पुनर्लग्नकी। तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक नीतिकी भाव- नाकी दृष्टिसे कुमारदेवीका वह पुनर्लग्न अवश्य निन्दनीय और हीन कार्य समझा जाता था। वैसे कार्यको समाज बड़ी हलकी दृष्टिसे देखता था और उस कार्यके करनेवाली व्यक्तिको बड़े कठोर भावसे समाजसे बहिष्कृत और तिरस्कृत किये करता था। यह तो उस एक-अद्वितीय भाग्यवती कुमारदेवीका लोकोत्तर पुण्यकर्म ही था, जिसके प्रभावसे उसकी कुक्षीमें ऐसे प्रभावशाली पुत्ररत्न पैदा हुए जिनकी समता रखनेवाले पुरुष, सारे संसारके इतिहासमें भी इने गिने ही दिखाई देंगे। इन पुत्र-पुङ्गवोंके प्रतापके कारण कुमारदेवी तत्कालीन समाजमें बड़ी भारी प्रतिष्ठाकी पुण्यभूमि बन सकी और सारे देशके जनोंसे बड़ी श्रद्धाके साथ पूजी और प्रशंसी गई। बड़े-से-बड़े धर्माचार्योंने, बड़े-से-बड़े कवियोंने, बड़े-से-बड़े राष्ट्रपुरुषोंने उसकी प्रतिमाकी पूजा की और उसके नामकी स्तुतियाँ गाईं। पर उसके जीवनका वह महत् प्रेमकार्य, जिसके वश हो कर उसने, अणहिलपुरके एक बड़े खानदानके प्राग्वाट कुटुम्बके पराक्रमी युवक ठाकुर आसराजके साथ पुनर्लग्न किया था, उसकी स्मृतिका किंचित् आभास भी उन समकालीन कवियों और ग्रन्थकारोंने अपनी कृतियोंमें न आने दिया। क्यों कि यह कार्य समाज और धर्मको नापसन्द था। उसकी स्मृतिको जीवित रखना अप्रिय था। श्रद्धेय और पूजनीय माता कुमारदेवीके पुण्य जीवनकी उस मानी गई कृष्णफलताका सूचन करना उन कवियोंके लिये बड़ा पातक कार्य था। महामात्य वस्तुपाल-तेजपाल जैसे जगत्श्रेष्ठ, पुण्यप्रभावक और धर्मोद्धार नरशिरोमणि विधवा-विवाहसे प्रसूत पुत्ररत्न थे, इस विचारको स्मृतिमें लाना भी उन ग्रन्थकारोंके लिये, शायद बड़ा दुखद और दुर्निवारक कर्तव्य था। इसलिये उन्होंने अपनी कृतियोंमें इसकी कहीं भी स्मृति नहीं होने दी। उन्हींका अनुगमन करनेवाले, वस्तुपाल-तेजपालके अन्यान्य पिछले प्रसिद्ध चरित्रकारोंने भी उस बातका कहीं सूचन नहीं होने दिया। परंतु मेरुतुङ्गने अपने ग्रन्थमें इस बातका बहुत ही संक्षेपमें पर बड़े स्पष्ट रूपसे उल्लेख कर दिया। ऐसा ही एक दूसरा स्पष्ट उल्लेख उन्होंने राणा वीरधवलकी माताके विषयमें भी किया है, जो भी इसी तरहका एक सामाजिक अपराधका ज्ञापक हो कर भी ऐतिहासिक तथ्य था। इन उल्लेखोंसे मेरुतुङ्ग सूरिकी सच्ची इतिहास प्रियताका हमको अच्छा आभास हो जाता है। बाकी उस समयके ग्रन्थकारोंके विषयमें, इससे अधिक विशुद्ध इतिहास-दृष्टिकी अपेक्षाकी कल्पना करना और उनमें धार्मिक या साम्प्रदायिक भावनाके पोषक विचारोंका दोषारोप कर, उनके अवाञ्छित कथनोंको भी उपेक्षा- की दृष्टिसे देखना, एक प्रकारकी निजकी ऐतिहासिक दृष्टिकी विपर्यासताका बोध कराना है। *