भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

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पृष्ठ 25

२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश विविध प्रकारके ग्रंथों और प्रबन्धोंको छोड़ कर बुद्धिमानोंको सुखसे जिनका बोध हो सके इसलिये गद्यरचना द्वारा ही मैं मेरुतुंग इस ग्रन्थकी रचना करना चाहता हूँ ३ ॥ ३ ॥ रत्नाकर ( समुद्र ) समान सद्गुरु संप्रदायसे, जब मेरी इस प्रबंधरूप चिन्तामणि (रत्न) के उद्धार करनेकी इच्छा हुई तो धीधर्मदेव ने सैकडो वार इतिहासकी बातें कह कहकर मानों मेरी सहायता की ४॥४॥ जिस प्रकार महाभारत ग्रन्थका प्रथम आदर्श ( पहली नकल ) गणेश ( गजाननने ) तैयार किया, उसी प्रकार इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक नये ग्रंथका प्रथम आदर्श गुणचन्द्र नामक गणेश ( गच्छपति ) ने सुन्दर रीतिसे तैयार किया ५ ॥ ५ ॥ बारंबार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं । इस लिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोंसे [ संकलित ऐसे ] इस प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूँ । ६ ॥ यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना ] से कहे गये प्रबंध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावों वाले अवश्य होते हैं; तथापि इस ग्रंथकी रचना सुसम्प्रदाय ( योग्य परंपरा ) के आधारपर की गई है; इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिये ७ ॥ ७ ॥

३ मेरुतुंग सूरिने इस ग्रंथकी रचना की उसके पूर्व, कुछ गद्य और कुछ पद्यमें, कुछ प्राकृत और कुछ संस्कृतमें,
कुछ पुरातन अपभ्रंश और कुछ अर्वाचीन देश्य भाषामें, इस प्रकारके कई छोटे बडे प्रबन्धात्मक ग्रन्थ विद्यमान थे । उन
ग्रन्थोंमैस अपनी मनोवृत्तिके अनुसार कितने एक विषय चुनकर मेरुतुंगने सरल सस्कृत गद्य रचना द्वारा इस ग्रन्थका संकलन किया ।
४ ग्रन्थकार मेरुतुंगसूरिके धर्मदेव नामक कोई वृद्ध गुरुभ्राता अथवा गुरुजन थे जिन्होंने समय समय पर
इतिहासकी सैकड़ों पुरानी बातें सुना सुनाकर इस ग्रन्थकी रचना सामग्रीमें यथेष्ट सहायता दी । इस लिये ग्रन्थकारने अपने गुरुके
बाद उनका भी सम्मानपूर्वक इस श्लोक द्वारा स्मरण और उपकृत भाव प्रदर्शित किया है ।
५ जैन ग्रन्थोंमें यति मुनियोंके समुदायको गण नामसे भी उल्लिखित किया जाता है। गणका नायक जो यति-
आचार्य होता है उसे गणेश-गणपति-गणनायक-आदि शब्दोंसे सम्बोधित किया जाता है। प्रबन्धचिन्तामणिका प्रथम आदर्श
तैयार करनेवाले गुणचन्द्र नामक गणी थे जो शायद मेरुतुंगसूरिके प्रधान शिष्य हों और उनके बाद उनके पट्टपर गणनायक बने
हों । गणेश शब्दसे, ग्रन्थकारने पुराण प्रसिद्ध देव गणपति ( गजानन विनायक ) जिन्होंने वेद व्यास कथित महाभारतकी
प्रथम नकल की, उसके साथ यहां पर श्लेषार्थ कर अर्थ घटना बताई है।
६ पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्राय सदा उन्हीं कथा-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महाभारत और
रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमें प्रसिद्ध हैं। एकही एकही कथा बारबार सुनकर विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता
यह सर्वानुभव सिद्ध बात है। मेरुतुंगसूरिने इस बातका विचार कर, कथाकारोंको, लोगोंका मनोरंजन करनेके लिए कुछ नई
सामग्री प्राप्त हो इस उद्देश्यसे, कितने एक इतिहास प्रसिद्ध और निकट समयवर्ती श्रेष्ठ पुरुषोंके ऐतिहासिक वृत्तान्तोंसे अलंकृत
ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की । ग्रन्थकारका यह कथन खास ध्यान देने योग्य है ।
७ मेरुतुंगसूरिने इस ग्रन्थकी संकलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्थोंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली
आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया। इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानोंको अवश्य ही उनमें
कुछ न कुछ भिन्नभाव मालूम पड़ता रहता है। मेरुतुंगसूरिको भी अपनी इस रचनामें और दूसरी अन्यकृत रचनामें कहीं कहीं ऐसा
विभिन्नभाव मालूम हुआ है। इस विभिन्नभावका निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और
न कोई उनको उसकी आवश्यकता थी। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि- इनमें जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित
की हैं वे एक सुसम्प्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं। इस लिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं।
प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होती हैं लेकिन मेरुतुंगसूरि उनके लिये निष्पक्ष और
निराग्रह हैं-यह बात इस श्लोकगत कथनसे सूचित होती है ।