भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश चारों ओर कहीं जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध पीनेको कहा और बोला कि- 'करचडी' करो । उसके ऐसा कहने पर वररुचि बड़ी चिन्तामें पड़ गया, क्यों कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रन्थमें नहीं पढ़ा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर हाथ रखकर और भैंसके नीचे बिठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट भर कर दूध पिलाया । उस (उपाध्याय) ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक 'करचडी' इस विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित पति निश्चित किया । भैंसोंसे हटाकर उसे अपने महलमें ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा करते हुए "ओं नम शिवाय" इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये हैं तो एक दिन शुभ मुहूर्त्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसभामें ले गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोभके कारण "उ श र ट" इस प्रकारके शब्दोंमें बोल गया । उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचिने उसकी [मूर्खता छिपाने और] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा- ४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है । रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके बलसे जो गर्वित है ॥ इस प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे 'उशरट' शब्द बनता है] वर रुचिने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी बातसे प्रसन्न होकर, राजाने उस भैंस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया । पर पण्डितके सिखानेसे वह सदा मौन ही रहा करता । राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया । उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नखमी लेकर, सारे अक्षरोंको बिंदु और मात्रासे रहित कर दिया । उसे ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सर्वत्र ही 'जामातृशुद्धि'१ की कहावत प्रचलित हुई। एक बार दीवाल परके चित्रमें भैंसोंका झुण्ड देखकर, आनदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया और उनके बुलानेकी विकृत बोली बोलने लगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका चरवाहा है । फिर यह (चरवाहा) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने लगा। अपनी पुत्रीके वैधव्यसे शंकित होकर राजाने२ रातके समय गुप्त वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर कि-'मै तुझे तुष्टमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशङ्कासे, स्वयं कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष होकर उसे अनुगृहीत किया । इस वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि-'क्या कुछ विशेष वाणी प्राप्त हुई है?' ३ उसके ऐसा कहनेपर वह तभीसे कालिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने कुमारसंभव प्रभृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये । -इस प्रकार यह कालिदासकी उत्पत्तिका प्रबंध है ॥ १ ॥ १ 'जामातृ शुद्धि' की कहावत हिंदीमें या गुजराती भाषामें प्रचलित हा ऐसा ज्ञात नहीं हुआ, लेकिन मराठी भाषामें 'जावाइ शोध' नामकी कहावत प्रचलित है । विक्रमार्क और और कथाओंमें भी इसका उल्लेख मिलता है इससे ज्ञात होता है पुराने समयमें यह कहावत गुजरात आदि देशोंमें भी प्रचलित होगी । २ पुत्रीका वैधव्य प्राप्त होनेकी शंका राजाको इसलिये हुई कि वह पशुपाल आमरणान्त उपवास करनेकी प्रतिज्ञा करके देवीकी आराधना करने बैठा था । मेरुतुंगसूरिका यह ग्रन्थ बहुत ही संक्षिप्त शैलीमें लिखा हुआ है, इसलिये इसमें बहुतसी बातें अध्याहृत रहती हैं । दूसरे त्रिबन्धोंमें ये बातें खुलासेके साथ लिखी हुई मिलती हैं ।