प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश १८) बादमें कान्यकुब्ज देशसे एक पञ्चकुल (कर वसूल करनेवाला) गुजरात देश का कर उगाहने आया। यह गुजरात देश उस कान्यकुब्ज देशके राजाने अपनी 'महणका' नामक कन्याको दहेजमें दे दिया था। इस पञ्चकुलने उस वनराज नामक पुरुषको अपना सेलभृत् (शस्त्राधिकारी) बनाया। छ महीने तक देशसे कर वसूल कर २४ लाख पारूथक द्रम्म (चाँदीके सिक्के ?) और ४ हज़ार अच्छी नस्लके तेजवान् घोड़े लेकर जब वह पञ्चकुल अपने देशको चला तो वनराज ने सौराष्ट्र नामक घाटपर उसे मार डाला और फिर उस राजाके भयसे साल भर तक किसी बनमें जाकर छिपा रहा। १९) इसके बाद, अपने राज्याभिषेकके लिये राजधानीरूप नगर बसानेकी इच्छासे एक अच्छी भूमि खोजने लगा। पीपलूला सरोवरके किनारे, अणहिल्ल नामका भारूयाड़ साखड़का लड़का जो सुखपूर्वक बैठा था, उसने पूछा किं- 'तुम यहापर क्या देख रहे हो ?' उसके प्रधानोंने यह कहनेपर कि नगर बसानेके योग्य अच्छी भूमि देखी जा रही है। वह बोला कि- 'यदि उस नगरको मेरे नामपर बसाओ तो मैं वैसी भूमि बताऊँ।' यह कहकर वह जाठि वृक्षके पास गया और वहां जितनी भूमिमें खरगोशके द्वारा कुत्ता त्रासित होता रहता था उतनी भूमिको उसने बताया। उसी भूमिमें वनराजने अणहिल्लपुर इस नामसे नया नगर बसाया। [यहाँपर, एक P नामक प्रतिमें अणहिल्लपुरकी प्रशंसा बतलानेवाले निम्नलिखित पद्य लिखे हुए मिलते हैं-] [६] जो (नगर) हारका अनुकरण करनेवाले प्राकार (खाई) से प्रकाशित हो रहा है, वह ऐसा लग रहा है मानों सत्ययुग वृत्ताकार होकर कटिसे उसकी रक्षा कर रहा है। [७] जिस नगरमें रातके आरंभमें चन्द्रशाला (ऊपरी तल) में खेलती हुई स्त्रियोंके मुखकी शोभासे आकाश ऐसा जान पड़ता है कि उसमें सैकड़ों चन्द्रमा उदय हुए हैं। [८-९] जिस नगरीके विजयी गुणके सामने लंका को शंका हो गई, चम्पा कापने लगी, विदिशा कृश हो गई, काशी की सम्पत्ति नष्ट हो गई, मिथिला का आदर शिथिल हो गया, त्रिपुरीकी शोभा विपरीत हो गई, मथुरा की आकृति मन्थर (सुस्त, फीकी) पड़ गई और धारा भी निराधार हो गई। [१०] जिस नगरके स्त्रीजन और कौरवेश्वरके सैन्यमें हम कोई अन्तर नहीं देखते क्यों कि दोनों ही 'गाङ्गेय-कर्ण' (स्त्री-पक्षमें सोना है कानमें जिनके; और सेना-पक्षमें भीष्म और कर्ण है जिनमें) हैं। [११] जिसके आगे प्रौढ़ शोभावाली अलकापुरी को पुलक नहीं होता (आनंदित नहीं होती), लंका अति शंकाकुला हो उठती है, उज्जयिनी की भी कभी जीत नहीं होती, चम्पा अति कांपती रहती है, कान्तिपुरी कान्तिविभूषिता नहीं होती, अयोध्या अतियोध्या हो जाती है, ऐसा यह अद्भुत पत्तन (अणहिल्लपुर) नगर है जिसमें लक्ष्मी सदा नाच करती रहती है। इस नगरकी जय हो। २०) श्रीविक्रमादित्यके संवत् ८०२ आठ सौ दोमें-प्रसंतरमें, संवत् ८०२ के वैशाख सुदी दूज, सोमवारको-उस जाठि वृक्षके नीचे बड़ा भारी राजप्रासाद बनाकर राज्याभिषेक लग्नके समय श्रीवनराजने काकर ग्रामकी रहनेवाली उस प्रतिज्ञात बहन श्रीदेवी को बुलाकर उसके हाथसे तिलक करवाया। उस समय उसकी आयु पचास वर्षकी थी। वह जांबा नामक वणिक महामंत्री बनाया गया। पञ्चासर ग्रामसे श्रीशी लगुणसूरिको भक्तिके साथ ले आकर धवल गृहमें अपने सिंहासनपर बैठाया और कृतज्ञोंमें श्रेष्ठ होनेके कारण सप्ताङ्ग राज्य उन्हें समर्पण किया। उन निःस्पृह सूरिने उसका बार बार निषेध किया। किन्तु उसने