प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश होशमें आकर उठा देता था। तभीसे चापोत्कटों का दान उपहासके रूपमें मशहूर हुआ१। वह इस प्रकार बार बार चिढ़ाया जानेपर एक दिन उसने अपने नौकरोंको तैयार किया और जब मामाने बेहोशीमें राज्यासनपर बिठाया तो उसे मारकर सचमुच ही वह राजा बन गया । २५) सं० ९९३ के आषाढ़ सुदी १५ वृहस्पति वारको, अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नमें, जन्मसे इक्कीसवें वर्षमें मूलराज का राज्याभिषेक हुआ । [ B P आदर्शमें ‘सं० ९९८ में श्री मूलराज का राज्याभिषेक हुआ’ ऐसा पाठ मिलता है । ] २४. २शास्त्रमें तो सुना जाता है कि मूलार्क (मूल नक्षत्रका सूर्य) सब प्रकारका कल्याण करता है। लेकिन आश्चर्य है कि वर्तमानमें तो मूलराज ही ने ऐसा योग कर दिया है। [ १२ ] *उस विभुने स्वप्नमें आकर कहा कि चापोत्कट वंशके राजा हैहय भूपतिके वंशमें वंशो- ज्ज्वला कन्या है। अगर तुमको वह दान की जाय तो निःशंक भावसे उसके साथ विवाह कर लेना क्यों कि वह मृगाक्षी अपने उदरमें सार्वभौम (चक्रवर्ती) राजाको धारण करेगी। [ १३ ] श्री गुर्जर मण्डलमें उसकी कुक्षिसे श्री राजिराजका पुत्र राजा श्री मूलराज पैदा हुआ। अपने अद्भुत महाप्रभावसे, जब वह दिग्विजयके लिये उद्यम करता था तो उस समय केवल पृथ्वी ही नहीं काँप उठती थी परन्तु उसके साथ उसके स्वामी राजाओंके दिल भी काँप उठते थे । [ श्रीसौराष्ट्र मण्डलमें श्री सा....सिंहके साथ युद्ध हुआ यह प्रबंध प्रसिद्ध है× । ] [ १४ } जिसने अपने शत्रुओंको जीत लिया ऐसे उस राजाको गूर्जरेश्वरोंकी राजश्री, उसके गुणोंसे आवर्जित होकर बाणरिपु (विष्णु) को लक्ष्मीकी तरह, स्वयं वरनेको आई । [ १५ ] उस महा इच्छावाले राजाने कच्छके राजा लक्षको, शत्रुको बुरी तरह घायल करनेवाले अपने बाणोंका लक्ष्य बनाया। [ १६ ] उस असामान्य पराक्रमीने लाटेश्वरके दुर्निवारणीय सेनानायक बाण (२?) पको मारकर हाथियोंको ग्रहण किया था। १ गुजरातमें, उस जमानेमें शायद यह एक लोकोक्ति प्रचलित थी कि—‘यह तो चावडोंका दान है’। किया हुआ दान मिलेगा या नहीं और मिलनेपर भी वह स्थिर रूपसे रहेगा या नहीं—ऐसा जिस दान पर विश्वास नहीं किया जाता उसे लोग चावडोंका दान कहकर उसका उपहास किया करते थ । २ मूलराज शब्द पर यह रूप है। इसका दूसरा अर्थ मूलराज यानि मूलचन्द्र यह निकाला गया। राज शब्द चन्द्रमाका भी वाचक है। ज्योतिष शास्त्रके विधानानुसार सूर्य जब मूल नक्षत्रमें आता है तब वह मूलार्क योग कहलाता है। यह योग अनेक तरहके शुभ कल्याणोंका करनेवाला माना जाता है। लेकिन यह राजा तो मूलार्क नही है मूलराज (=मूलचन्द्र ) है, तो भी इसने अपने उदयकालमें वैसे ही अनेक कल्याणकारक योग कर बतलाए हैं, इसलिये यह खास आश्चर्यकी बात है।
- १२ और १३ अक वाले ये दोनों पद्य किसी पुरानी प्रशस्तिमेंसे उद्धृत किये गए मालूम देते हैं। पहले पद्यमें यह बतलाया गया है कि-शायद शम्भु या अन्य किसी देवने मूलराजके पिता राजिराजका स्वप्नमें आकर यह कहा कि-चापोत्कट वंशका राजा, जो हैहय वंशका है, उसकी गुणवती कन्यासे विवाह करनेके लिये तुझस कहा जाय तो उसे निःशंक होकर ब्याह लेना । क्यों कि उसकी कूँखमें ऐसा गर्भ उत्पन्न होगा जो सार्वभौम राजा बनेगा। यह पद्य ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वका है। इसमें चापोत्कट वशको हैहयवश कहा है। चावड़ाओंके मूल वशका विचार करनेके लिये यह एक नया उल्लेख है। विशेष विचारके लिये अगला विवेचनात्मक भाग देखना चाहिए । × यह पंक्ति, मूल प्रतिमें अपूर्ण ही प्राप्त हुई है। इसका स्पष्ट कथन क्या है सो ज्ञात नहीं होता। सौराष्ट्रके किसी राजाके साथ मूलराजके युद्ध होनेका इसमे उल्लेख किया गया मालूम देता है। यह पंक्ति दूसरी दूसरी प्रतियोंमें नहीं मिलती।