भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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प्रकरण ३०-३४ ] मूलराजादिका प्रबन्ध मूलराजके वंशज । [ १८ ] अपने सारे शत्रुओंको समाप्त करके जब वह-( मूलराज )-कथाशेष होगया ( मृत्युंको प्राप्त हुआ ) तो उसके बाद पृथ्वीमण्डलका आभूषण ऐसा चामुण्डराज राजा हुआ । [ १९ ] उसकी सेनाका साज, शत्रुओंकी स्त्रियोंके मनको संतप्त होनेकी विद्या सिखानेमें निपुण पण्डित था और उसके सैन्यने इन्द्रको भी भयभीत कर दिया था । [ २० ] उसके हाथरूपी कमलमें रहनेवाली, कोश ( १ म्यान; २ कमल ) में विलास करनेसे चमकती हुई तलवार रूपी भौंरोंकी श्रेणीने राजाओंके वंशोंको भिन्न कर दिया । ३०) संवत् १०५३ से लेकर १३ वर्षतक चामुण्डराजने राज्य किया । [ २१ ] जिसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें प्रकाशित हो रही है, और जो महीपतियोंमें श्रेष्ठ माना जाता है ऐसा वल्लभराज नामक उसका पुत्र राजा हुआ । [ २२ ] वह दृढ़ पौरुषवाला राजा शत्रुओंकी नगरियोंको घेरे रहता था इसलिये विशेषज्ञोंने उसका नाम 'जगत्-झम्पन' रखा था । ३१) सं० १०६६ से लेकर ६ महीने तक राजा वल्लभराज ने राज्य किया । [ २३ ] जिसमें रजोगुण और तमोगुणका अभाव था और जिसके जैसा यश प्राप्त करना औरोंके लिये अत्यंत दुर्लभ था, ऐसा दुर्लभराज नामका उसका छोटा भाई [ उसके बाद ] राजा हुआ । [ २४ ] साँपकी भाँति, काल करवाळ ( कठिन तलवार ) से सुरक्षित होकर उसका राज्य, निधानके समान, अन्यों ( शत्रुओं )का भोग न हो सका । [ २५] सौभाग्यसे प्रकाशमान उस राजाका कर ( १ हाथ; और २ मालगुजारी ) सर्वथा अनुपभोग्य ऐसी परस्त्री पर और ब्राह्मणोंको प्रदान की हुई भूमिपर, कभी नहीं पड़ा । ३२) सं० १०६६ से लेकर ११ साल ६ महीने तक श्रीदुर्लभराजने राज्य किया । इस राजा दुर्लभने पत्तन में 'दुर्लभ सर' नामक सरोवर बनवाया । [ २६ ] फिर, उसके भाईका लड़का 'भीम' नामक राजा हुआ जिसकी प्रवृत्ति तीनों जगत्‌को अभीष्ट फल देनेवाली हुई । * [ यहाँ A आदर्शका अनुसरण करनेवाली मुद्रित पुस्तकमें, यह समय-सूचक पाठ इस प्रकार है-] [ इसके बाद सं० १५० (? १०५२ ) श्रावण सुदी ११ शुक्रवारको पुष्य नक्षत्र और वृष लग्नमें श्रीचामुण्डराज का राज्यारोहण हुआ। इसने पत्तन में चन्द्रनाथ देव और चाचिणेश्वर के मन्दिर बनाये । सं० ५५ (? १०६५) आश्विन सुदी ५से लेकर १३ वर्ष १ मास २४ दिन राज्य किया । सं० १०५५ (? १०६५) आश्विन सुदी ६ मंगळवार, ज्येष्ठा नक्षत्र, मिथुन लग्नमें श्रीवल्लभ राजदेव गद्दी पर बैठा । इस राजाने जब मालवा देशकी धारानगरी के प्राकार (किलेको) घेर रक्खा था उसी समय शीतली, रोगसे इसकी मृत्यु हुई । इसके दो विरुद थे-'राज मदन शंकर' ( राजारूपी कामदेवके लिये शिव ) और 'जगज्झम्पन' । सं० १० (? १०६६) चैत्र सुदी ५ से लेकर ५ महीने २९ दिन तक इस राजाने राज्य किया । ७-८