भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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२८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश उतार कर फिरसे वैसे चढ़ा देते थे । इस प्रकार दो तीन बार कराया । प्रसन्न होकर राजा सोम्ब लका भी इसी प्रकारका मर्दन करवाने लगा । उसके अंगोंके उतार लेनेपर जब वह निश्चेष्ट हो गया तो आँखें निकलवा लीं । [क्योंकि] सुसज्जित अवस्थामें तो उसकी आँख निकालनेमें कौन समर्थ हो सकता था ? । अतः इस प्रकार मुञ्जने उसकी आँखें निकलवा लीं और फिर उसे काठके पींजरेमें बंद करा दिया । उसके भोज नामक पुत्रका जन्म हुआ। उस पुत्रने सभी शास्त्रोंका खूब अभ्यास किया। छत्तीस प्रकारके आयुधोंका आकलन कर, बहत्तर कलारूपी समुद्रका पारगामी बना । इस तरह सभी लक्षणोंसे युक्त होकर वह बड़ा होने लगा । उसके जन्म समय किसी निमित्तज्ञ ज्योतिषीने जन्मकुण्डली बना कर दी [ जिसमें लिखा था कि-] ३४. पचपन वर्ष, सात मास, तीन दिनतक भोजराजा गौड़ देशके साथ दक्षिणापथका भोक्ता होगा । इस श्लोकके अर्थको जब मुञ्जराजने समझा, तो सोचा कि इसके रहनेपर मेरे लड़केको राज्य नहीं होगा; इस आशंकासे उसने भोजको, वध करनेके लिये अन्त्यजोंके सुपुर्द किया । उन्होंने रातको उसकी मधुर मूर्ति देखकर, अनुकम्पाके साथ कापते हुए कहा कि-अपने इष्ट देवताको याद करो। इसपर भोजने निम्नलिखित 'काव्य, पत्रपर लिखकर, मुञ्जराजको देनेके लिये समर्पण किया । ३५. सत्ययुगके अलंकारके समान वह राजा मान्धाता चला गया । जिस रावणके शत्रु रामचन्द्रने महासागरमें सेतु बांधा था वह भी आज कहां है? और फिर युधिष्ठिर प्रभृति अनेक राजा जो आपके समय तक हो गये हैं, सब चले गये; पर यह पृथ्वी किसीके भी साथ नहीं गई ! पर मैं समझता हूं, तुम्हारे साथ तो जायगी ! राजा उसे पढकर मनमें अत्यन्त खिन्न हुआ और बालहत्या करनेवाले अपने आपकी निन्दा करने लगा। [ २७ ] हाय, हे भोज ! मरण कालमें कहा हुआ तुम्हारा काव्य हृदय वेध रहा है । दौर्भाग्यके स्थान समान मुझ पापी, दुष्टको तुम्ही शरण हो । [ २८ ] हे गुणागार भोज ! तुझ बिना इस राज्यसे मुझे क्या काम है ! अरे कोई चिता सजा दो, ता- कि मैं मरकर जाकर भोजसे मिलूं । तत्र मंत्रियोंने राजाको प्रबोधित करते हुए यह वाक्य कहा- [ २९ ] हे स्वामिन् ! यह अति अज्ञान सूचक है जो इस तरह अब आप बोल रहे हैं। जानना वही प्रमाण है जो ऐसी कदर्थनाका कारण न हो । -इस प्रकार बारंबार विलाप करने लगा । ] ३७) बादमें, उनके पाससे अत्यन्त आदरके साथ बुलवाकर उसे युवराजकी पदवी देकर सम्मानित किया । तैलपदेव नामक तैलङ्ग देशके राजाने सेना भेज कर उस (मुञ्ज) पर आक्रमण किया । उस समय रुद्रादित्य नामक महामंत्री रोगग्रस्त था; उसके बारंबार निषेध करनेपर भी मुञ्जने उसके ऊपर चढ़ाई करना चाहा । [ मंत्रीने कहा- [ ३० ] हे महाराज ! हमारी सीख मान लीजिये, अवहेला न कीजिये । तुम्हारे उधर चले जानेपर इस (मुञ्ज) मंत्रीको भीख माँगनी पड़ेगी । [ ३१ ] तुम्हारे बैठे रहनेपर और मेरे डाँघ (चले ) जानेपर राजाका राज्य रूठ जायगा । ऐसा होनेपर बडा ही अकाज होगा और उसकेलिये तुम मालमके धनी जानो ।