प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३७ भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्द्धा । ४५) इसके बाद, एक समय, संधिपत्रके होते हुए भी, संधिमें दोष उत्पादनके विचारसे भोज राजाने गूर्जर देशकी बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने सान्धिविग्रहिकके हाथ, भीमके पास यह [ प्राकृत ] गाथा लिख भेजी- ६२. क्रीडा मात्रमें जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप फैल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ न तो विग्रह ही [शोभता है] और न सन्धि ही [रहती है]। भीमने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियोंसे गाथा माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको निःसारार्थक देखकर यह सोचमें पड़ गया। उसी समय नगरमेंके जैन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज बजी हुई नर्तकीको खम्भेके पास खड़ी हुई देखकर मंत्रीने वहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तंभ-वर्णनके लिये कहा । यह बोला- [४८] हे स्तंभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयौवनाकी, कंकणाभरण आदिसे सज्जित बाहुलतासे [वेष्टित होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो; सो सचमुच ही तुम पत्थरके बने हो यह निश्चित होता है। [आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह बात जब मंत्रीने राजासे कही तो राजाने [उसके गुरु ] आचार्यको बुलाकर उस विषयमें पूछा- ६३. विधाताने भीमको अन्धकके * पुत्रोंको मारनेके लिये ही निर्माण किया है। जिस भीमने सौ [ अन्धक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अकेलेकी क्या गणना है ! ' इस प्रकार गोविन्दाचार्यकी बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेवाली इस गाथाको दूतके हाथ भेजकर, सन्धिका दोषको दूर किया । ४६) बादमें किसी एक रातको, जाड़ेके दिनोंमें, राजा जब वीरचर्यामें घूम रहा था, तो किसी मन्दिरके सामने, किसी पुरुषको यह पढ़ते सुना- ६४. मेरा पेट भूखसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें फूंकते फूंकते आग ठंडी हो गई है, चिन्ताके समुद्रमें डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फलकी तरह सिकुड़ गया हूँ। निद्रा अपमानिता स्त्रीकी भाँति कहीं दूर चली गई है; और सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नहीं हो रही है। यह सुनकर रात बिताकर सबेरे उसे बुलाकर पूछा-'किस प्रकार तुमने रात्रिशेषमें शीतका अत्यन्त उपद्रव सहन किया ?'। 'सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इत्यादि कथनकी ओर संकेत करके उसने कहा था। [ यह बोला- ] 'महाराज ! मैं खूब गाढ़े तीन वस्त्रोंसे जाड़ा काटता हूँ।' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन वस्त्र क्या हैं ? तब उसने फिर कहा- ६५. रातमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे राजन्! घुटने, सूर्य और आगके बलपर मैं शीत काटता हूँ। जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन लाखका दान देकर सन्तुष्ट किया। ६६. तुमने अपनी आत्माको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमूर्ती धनवान पुरुषोंको मुकुरून्
- यहाँपर 'अन्धक' इस शब्दपर श्लेष है। कौरवोंका पिता धृतराष्ट्र अन्धा था इसलिये उनको अन्धक कहा है। भोजका पिता सिंधुल भी अन्धा था इसलिये उसका विशेषण भी अन्धक सार्थक है।