भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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४६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश उस देशके उपासकोंद्वारा अत्यन्त अभ्यर्थनाके साथ गुरुको बुलानेपर, सकल शास्त्ररूपी समुद्रके पारको प्राप्त कर लेनेवाला वह शोभन नामक तपोधन गुरुसे अनुमति लेकर वहाँ आया । धारा में प्रवेश करते ही, पडित धनपालने, जो उस समय राजपाटिका में [ राजाके साथ ] भ्रमणमें जा रहा था, उसे न पहचान कर, उपहासके साथ कहा- 'गर्दभदन्त ( गधेके समान दाँतवाले) भदन्त, तुमको नमस्कार !' इसपर उसने- 'कपिके वृषणके समान मुँहवाले मित्र, तुम्हें सुख हो !' [ इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया । तब चमत्कृत होकर धनपालने सोचा कि मैने तो दिल्लगी में भी 'नमस्ते' कहा और इसने तो 'मित्र तुम्हें सुख हो' ] इतना ही कहकर अपनी वचन-चातुरीसे मुझे जीत लिया । फिर धनपालके यह कहने पर कि 'आप किसके अतिथि हैं ?' शोभनमुनि ने कहा- 'हमें आपके ही अतिथि समझिये !' उसकी यह बात सुनकर एक विद्यार्थीके साथ उन्हें अपने स्थानपर भेजकर वहीं ठहराया । स्वय घर आकर धनपाल ने प्रिय आलापोंके साथ उसे सपरिकर भोजनके लिये निमंत्रित किया । पर वे तपोधन तो प्रातुक ( अनुद्दिष्ट ) आहार भोजी थे इसलिये उन्होंने निषेध किया । आग्रहपूर्वक जब उसने दोषका हेतु पूँछा तो कहा- ८५. मुनि म्लेच्छ कुलसे भी मधुकरी वृत्तिके साथ भिक्षा ग्रहण करे परन्तु बृहस्पति के समान श्रेष्ठ कुलीन एक ही गृहस्थके यहाँ भोजन न करे । इसी प्रकार जैन धर्मके दशवैकालिक सूत्रमें भी कथन है- ८६. जो अनिश्रित हो कर मधुकरके समान नाना स्थानोंमेंसे अपना भिक्षापिण्ड प्राप्त करते हैं उन्हीं बुद्ध और दान्त भिक्षुओंको साधु कहते हैं । इस प्रकार, अपने धर्मसे और परधर्मसे भी, निषिद्ध ऐसे कल्पित आहारको त्याग करके हम लोग शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं । धनपाल उनके चरित्रसे चकित होकर चुप हो रहा और उठकर स्नान करने चला गया । स्नानके आरम्भमें ही अचानक भिक्षाचर्याके लिये आये हुए उन दो मुनियोंको देखा । उन्हें एक ब्राह्मणी, रसोई तैयार न होनेके कारण, दही देने लगी । मुनियोंने पूँछा कि दही कितने दिनोंका है ? तो धनपाल ने मजाक करते हुए कहा 'क्या कोई उसमें कीड़े पड़ गये हैं?' ब्राह्मणीने जनाब दिया कि इसे दो दिन बीत चुके हैं । यह सुनकर दोनों मुनि बोले कि-हाँ कीड़े पड़ गये हैं ! यह सुनकर धनपाल उसे देखनेके लिये स्नानसे उठकर वहाँ आया । पात्रमें रखे हुए दहीके पास ही एक महावर ( लाख ) का ढेला रखा जिस पर उन जीवोंने चढ़कर उसे दहीके समान ही सफेद कर दिया । धनपाल ने यह देखा और सोचा कि जैन धर्ममें जीव रक्षाकी ही प्रधानता है; और उसमें भी जीवोत्पत्ति विषयक ज्ञानका वैदग्ध्य [विशिष्ट प्रकारका ] है । जैसा कि कहा है- ८७. मूग और उड़द इत्यादि द्विदल धान्य जो कच्चे गोरसमें पड़े तो उसमें त्रस (द्विइन्द्रियादि) जीवोंकी उत्पत्ति होती है; और तीन दिनके बाद दहीमें भी जीवोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है । यह बात एक जैन शास्त्रमें ही कही गई है । ऐसा निश्चय करके शोभनमुनिके शुभोपदेशसे सम्यक् विश्वास पूर्वक उसने सम्यक्त्व (जैन धर्म) ग्रहण किया । [ इतने दिनोंके बाद अपने मिथ्यात्वको समझते हुए, सो मनसे ही पूँछा कि मेरे भाईको भी कहीं देखा है ? शोभन ने वय, आस्था और गुण आदिमें अपने-ही-से उसकी तुलना की । इसपर उसने अनुमानसे समझा कि यही मेरा भाई है । यह निश्चय करके आनन्दाश्रु त्याग करते हुए उसे आलिंगन करके अपने लडकेको भेज कर उसके गुरुको भी बुलवाया।] स्वभावतः ही धनपाल बडा बुद्धिमान था अतएव कर्म्मप्रकृति प्रभृति जैन-विचार-ग्रन्थोंमें भी बड़ा प्रवीण हुआ । प्रति दिन सबेरे जिन पूजाके अन्तमें-