प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ५८-७९ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ४९ ५८) इसके अनन्तर एक बार राजा सरस्वतीकण्ठाभरण नामक प्रासादमें जा रहा था। उस समय धनपाल पण्डितसे, जो सदा सर्वज्ञ-शासन (जैन धर्म) की प्रशंसा किया करता था, पूछा कि 'सर्वज्ञ तो कभी एक बार हुए थे। पर अब भी उस धर्ममें क्या कुछ ज्ञानातिशय है ?' उसके ऐसा कहनेपर [धनपाल बोला-] 'अर्हत् विरचित (उपदिष्ट) अर्हन्तचूडामणि नामक ग्रन्थमें त्रैलोक्यके तीनों कालके वस्तु विषयके स्वरूपका परिज्ञान आज भी वर्त्तमान है।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने पूछा कि 'हम लोग अभी इस तीन दरवाजेके मण्डपमें स्थित हैं। किस रास्ते होकर यहाँसे बहार निकलेंगे?' राजाको इस प्रकार शास्त्रपर शुल्क लगानेको उद्यत होते देखकर उसने 'बुद्धि यह तेरहवीं मात्रा है' इस लोकोक्तिको सत्य करते हुए, भोजपत्रपर राजाके प्रश्नका निर्णय लिख कर उसे मिट्टीके गोलेमें रख दिया, और उसे ताम्बूलग्राहकको सौंपकर राजासे बोला कि 'महाराज, पधारिये !' राजाने अपनेको उसकी बुद्धिके जालमें फँसा समझा और सोचा कि इसने तीनमेंसे ही किसीका निर्णय किया होगा, इसलिये बढ़इयोंको बुलाकर मण्डपकी पद्मशिलाको हटवा दिया और उसी मार्गसे बहार निकला। फिर उस मिट्टीके गोलेको तोड़कर उसके लिखित अक्षरोंमें, निकलनेके लिये उसी मार्गके निर्णयको पढ़कर कौतुकसे चित्तमें चकित होता हुआ जैन धर्मकी ही प्रशंसा की। (यहाँ D पुस्तकमें निम्नलिखित पद्य अधिक पाये जाते हैं-) [ ६४ ] जो चीज विष्णु दो आँखोंसे, शिव तीनसे, ब्रह्मा आठसे, कार्तिकेय बारहसे, रावण बीससे, इन्द्र दस सौसे और जनता असंख्य नेत्रोंसे भी नहीं देख पाती, बुद्धिमान पुरुष उसीको एक प्रज्ञा- (बुद्धि) रूपी नेत्रसे स्पष्ट देख लेता है। (Pb आदर्शमें यहाँ निम्नलिखित एक और कथन अधिक पाया जाता है-) एक बार जलाशय (तालाब) के अच्छे-बुरे-पनके विषयमें पूछ हुई [सो पण्डितने कहा-] [ ६५ ] सचमुच ही तालाबोंमेंका ठंडा और चन्द्रमाकी किरणोंसे श्वेत बना हुआ जल खूब पी करके प्राणियोंकी सारी तृष्णा नष्ट हो जाती है और वे मनमें प्रमुदित होते हैं, परन्तु जब सूर्यकी किरणे उसे सोख लेती है तो [उसमेंके] अनन्त प्राणी विनष्ट हो जाते हैं और इसीलिये मुनि- लोग कुआँ बावड़ी आदिके बनानेके विषयमें उदासीन भाव प्रकट करते हैं। एक बार राजा अपने बनवाये हुए बहुत बड़े नये तालाबके पास गया। यहाँ पण्डितसे पूछा कि यह धर्मस्थान कैसा है। धनपाल बोला- [ ६६ ] तड़ागके बहाने यह आपकी [एक] दानशाला है जिसमें सदा ही मछली आदि जलजन्तु अच्छी तरहकी रसोई है और जिस स्थानपर बक, सारस, चक्रवाक आदि [मत्स्य भोजी दान ग्रहण करनेवाले] पात्र हैं, वहाँ कितना पुण्य होता होगा सो तो हम नहीं जान सकते। इससे राजा [मनमें] कुपित हुआ। नगरको आते समय वाटिकाके साथ एक बुढ़ियाको वृद्धावस्थासे सिर धुनती हुई देखकर राजाने पूछा-'यह सिर क्यों धुन रही है!' तब धनपाल बोला- [ ६७ ] क्या यह नदी है, या विष्णु? क्या कामदेव है या चन्द्रमा? क्या विधाता है अथवा विद्याधर है? क्या इन्द्र है, कि नल है, कि कुबेर है? ना, ना, यह नहीं है, यह भी नहीं है, यह भी नहीं है, बिल्कुल यह नहीं, यह भी नहीं, वह भी नहीं, और वह भी नहीं, यह तो क्रीड़ा करनेमें प्रवृत्त वैसा हे सखे ! स्वयं राजा भोजदेव है। [इसके सिरके धुननेका यह मतलब है-ऐसा कह कर] इस श्लोकसे रुष्ट राजा को सन्तुष्ट किया। १३-१४