प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश तब भोजने बहुत मानके साथ धनपाल को बुलाया। उसे आते सुन कर ही वह वादी भाग गया। लोगोंने हँसकर कहा-धर्मस्य त्वरिता गतिः=धर्मकी गति शीघ्र होती है। [इस कहावतको उसने चरितार्थ किया] राजाने सम्मान किया....और वहाँपर योगक्षेमके निर्वाह (गुज़र) की क्या हालत थी सो पूछी। पंडित बोला- [६८] हे राजन्, इस समय हमारा और आपका घर समान है, क्योंकि दोनों ही पृथुकार्तस्वर पात्र (१ गंभीर आर्तनादका पात्र, और २ विपुल सुवर्णपात्रवाला) हैं, दोनों ही भूषित निःशेष परिजन है (१ अलंकारहीन परिजनवाला, और २ सारे परिजन जिसमें भूषित है, ऐसा) हैं, और दोनों ही विलस त्करेणुगहना (१ धूलिपूर्ण, और २ हाथियोंसे सुसज्जित) हैं। (यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित और विशेष पंक्तियाँ पाई जाती हैं-) एक बार उसने भोज की सभामें यह काव्य पढ़ा- [६९] हे धाराके अधीश्वर ! पृथ्वीके राजाओंकी गणनामें कौतूहलवान् होकर इस ब्रह्माने आकाशमें खड़ियासे लकीर खींच खींचकर तुम्हारी ही (अकेलेकी) गणना की। वही रेखायें यह स्वर्गंगा हो गई हैं और तुम्हारे समान पृथ्वीमें अन्य भूमिधव (राजा) का अभाव होनेसे उसने उस खड़ियाको फेंक दिया वही यह हिमालय बना है। अन्य पंडित इस काव्य [को अत्युक्ति] पर हँसे। पर धनपालने कहा- [७०] वाल्मीकिने वानरोंसे आहत (मँगवाये गये) पर्वतोंसे समुद्रको बँधवाया और व्यासने अर्जुनके बाणोंसे। तथापि उनकी बातें अयुक्ति नहीं समझी जाती। हम तो कुछ प्रस्तुत विषय ही कहते हैं, तथापि लोग मुँह फाड़ कर हँसते हैं ! इसलिये हे प्रतिष्ठे, तुझे नमस्कार है। एक बार किसी पण्डितके यह कहनेपर कि-हे राजन्, महाभारतकी कथा सुनिये, उसपर परम आर्हत पंडितने कहा- [७१] कानीन (कुमारी कन्याके पुत्र=व्यास) मुनि, जो अपनी भ्रातृवधूके वैधव्यका विध्वंस करने वाला है, उसकी रचना, जिसमें गोलक (विधवा पुत्र) के पाँच पुत्र पाण्डव नेता हैं, जो स्वयं कुंड (जीवितपतिका स्त्रीके अन्य उपपतिसे उत्पन्न पुत्र) है। कहा गया है कि ये पाँचो समान जातिके हैं ! इनका संकीर्तन करना भी यदि पुण्य-कर और कल्याण-कारक हो तो फिर पापकी दूसरी कौन सी गति होगी ? ६१) शोभन मुनिकी 'शोभन चतुर्विंशतिकास्तुति' प्रसिद्ध ही है। 'इस समय क्या कोई [नया] प्रबंध आदि लिखा जा रहा है?' राजाके यह पूछनेपर धनपालने कहा- [७२] गलेमें उतरनेवाली गरम कांजीसे, जल जानेकी आशंकाके कारण सरस्वती मेरे मुँहसे निकल कर चली गई है। इसलिये वैरीयोंकी लक्ष्मीके केश पकड़नेमें व्यग्र हाथवाले महाराज ! मेरे पास अब कवित्व नहीं रहा। राजाने [प्रसन्न होकर दूध पीनेके लिए] सौ गायें दिलवाईं। राजाने जब यह पूछा कि 'गायें मिलीं !' तो- [७३] हे नरवर ! ये गौ तो दूध देती नहीं है और ना ही इन सौमेंसे एकको भी बछड़ा है। इन सौमेंसे बड़ी मुश्किलसे घासखा पाती हुई २० गायें घर तक पहुँच सकती हैं ! इस प्रकार धनपालने [उन बुड्ढी और बेकार गायोंकी] बात कही।