भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

प्रकरण ७४-७६ ] भोज और कर्णका संघर्ष [ ६१ चतुर्थ, सप्तम, और दशम ) में हों, तथा पाप ग्रह तृतीय, षष्ठ और एकादशमें हों, तो जो पुत्र होगा वह सार्वभौम राजा होगा। यह सुन कर, निश्चित प्रसव समयके बाद, १६ पहर तक, योगकी युक्तिसे गर्भस्तंभ करके ज्योतिषीके निर्णीत लग्नमें कर्ण नामक पुत्रको उसने जन्म दिया। उस गर्भधारणके दोषसे पुत्रप्रसवके अनन्तर आठवें पहरमें वह मर गई। सुलग्नमें जन्म होनेके कारण कर्णने अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त किया। एक सौ छत्तीस राजाओंके, भौंरेके समान काले-काले केश-कलापसे उसके दोनों विमल चरण-कमल पूजे जाते थे और चारों प्रकारकी राजनीतियोंमें परम प्रवीणता प्राप्त करके, विद्यापति प्रभृति महाकवियोंसे वह स्तुत होता था। जैसे [ एक बार कर्पूर कविने कहा-] १२२. + जिनके मुंहमें तो 'हारावाप्ति'१ है, आँखोंमें 'कंकणभार'२ है, नितंबमें 'पत्रावली'३ है, और दोनों हाथ 'सतिलक'४ है—हे श्री कर्ण ! तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियोंको, विधिवश, वनमें, इस समय भूषण पहननेकी यह कैसी [विलक्षण] रीति ग्रहण करनी पड़ी है। ऐसा कहने पर चतुर चक्रवर्ती राजाने कहा—'यदि 'विधिवश' ऐसा हुआ तो फिर वर्णनीय राजाका क्या रहा ? दैवने भी जिस बातकी चिन्ता नहीं की वह हो।' अतएव राजाको इसमें कुछ भी चमत्कार नहीं जान पड़ा और उसे बिना कुछ दिये ही विदा कर दिया। घर जाने पर भार्याने पूछा-'क्या दिया राजाने?' उसने कहा—'वही वृत्तस्वरूप !' (अर्थात् श्लोकमें जो वर्णन किया गया है वही स्वरूप) वह बोली- यदि 'विधिवशात्' की जगह 'त्वत् वशात्' कहा गया होता तो वह सब कुछ दिलाता। तब फिर नाचिराज कविने कर्ण नृपकी स्तुति की। जैसे- [८१] गोपियोंके पीन पयोधरसे विष्णुका हृदय [रूपी कमल] आहत हो गया है इसलिये मैं समझता हूँ कि लक्ष्मी कमलकी आशंकासे तुम्हारे नेत्रोंमें ही अब विश्राम कर रही है। इसलिये हे श्रीमन् कर्ण नरेश ! जहाँ तुम्हारी भ्रूलता चलती है वहाँ भयभ्रान्त हो कर दारिद्यकी मुद्रा टूट जाती है। इससे अत्यन्त तुष्ट हो कर राजाने हाथके मारुले इत्यादिके उचित दानसे उसे पुरस्कृत किया। इस प्रकार जब वह मार्गमें आ रहा था, तो कर्पूर कविने खीस कहा कि राजाने मुझे जो कुछ दिया है उसे, अब मैं अपने घर ले आता हूं। यह कह कर वह उसके सामने गया। [२२] 'हे कन्ये ! तू कौन है?'-'कर्पूर कवि ! क्या तू मुझे नहीं पहचानता ?'-'क्या भारती है?'-' 'सच है'-'तू विथुरा क्यों है?'-'मैं लूट ली गई!'-'माँ किसके द्वारा ?'-'दुष्ट विधाताके द्वारा'- 'उसने तुम्हारा क्या ले लिया ?'-'मुझ और भोज रूपी दोनों आँख '-'तो जी कैसे रही हो?' --'क्योंकि दीर्घायु श्री नाचिराज कवि अन्धेकी लकड़ी रूप बने होनेसे।' नाचिराज कविने इस काव्यसे सन्तुष्ट हो कर कर्णराजसे जो कुछ स्वर्ण, दुकूल आदि प्राप्त किया था वह सब कर्पूर कविको दे दिया। कर्ण नरेन्द्रने यह सुना, तो कर्पूरको बुलाके पूछा कि-' हे कवे ! भोज के विद्यमान रहते 'मुझ-भोज' यह पद कैसे उदाहृत किया ?' वह बोला-'महाराज, जल्दी में 'हर्ष- मुझ' की जगह मुझ-भोज मुंहसे निकल गया।' तब राजाने सोचा कि यह बात भोजका अमंगल सूचित करती है। [८३] श्रीमत् कर्ण नरेन्द्रने मान और विनयसे सब याचकोंका मनोरथ पूर्ण कर दिया, इसलिये चिन्तामणिके आँगनमें शिखावाली दूर्वायें हमेशा श्यामल हो रही है। कल्पतरुके शून्य तटमें निर्भीक होकर पशु-पक्षी बैठ रहे हैं। और कामधेनु निकट ही रुडंदको बेटा कर आलस्यमे निद्रा ले रही है।

  • इस पद्यमें शब्दोंके श्लेष द्वारा दो भिन्न अर्थ निकाले गये हैं । १ हारावाप्ति=हारकी प्राप्ति और 'हा' ऐसा 'राव' शब्दकी प्राप्ति । २ कंकण=हाथका आभूषण और क=कनी उसका कण=अश्रुबिंदु । यों तो पत्रावली स्तन पर बंधी जाती है, लेकिन इन स्त्रियोंको तो पहननेके लिये पूरा वस्त्र नहीं है इस लिये पत्रवर्गोंसे नितंब प्रदेशको ढाकना पड़ा है। ४ सतिलक तो कपाल होता है लेकिन इन स्त्रियोंके तो अब हाथ ही सतिलक=तिलवाले हैं।