भारतकोश
प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 181 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

प्रकरण ७९-८४] कर्णराजा और मयणल्लादेवीका वृत्तान्त [ ६५ ८०) इसने पत्तनमें श्री भीमेश्वरदेव और भट्टारिका (पटरानी) भीरु आणीके [नामसे शिवके] प्रासाद बनवाये। संवत् १०७७ से लेकर ४२ वर्ष १० मास ९ दिन राज्य किया । (B. P: प्रतियोंमें- संवत् १०६५ से आरंभ कर ४२ वर्ष राज्य किया।) कर्णराजा और मयणल्लादेवीका वृत्तान्त । ८१) उसकी रानीने जिसका नाम उदयमति था [और जो नरवाहन खंगारकी लड़की थी], पत्तनमें एक बहुत बडी नयी वापी (बावडी) बनवाई, जो सहस्रलिंग सरोवरसे भी कहीं अधिक आकर्षक थी। ८२) इसके बाद, सं० ११२० चैत्र वदि ७ सोमवार, हस्त नक्षत्र, मीन लग्नमें श्री कर्णदेवका राज्याभिषेक हुआ। ८३) इधर, शुभकेशी नामक कर्नाट देश का राजा घोड़ेसे [जिसको अपने काबूमें न रख सकनेके कारण] उठाया जा कर किसी घने जंगलमें जा पड़ा। वहाँ पत्र फलसे भरे किसी वृक्षकी छायाका उसने आश्रय लिया। उसके पास ही दावाग्नि लगी। जिस वृक्षने [अपनी छायामें] विश्राम दे कर उपकार किया था उसे, कृतज्ञताके कारण छोड़ कर चले जानेकी उसकी इच्छा न हुई। और इसलिये, उसीके साथ दावानलमें उसने अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। फिर इसके बाद, मंत्रियोंने उसके पुत्र जयकेशीको राज-पद पर अभिषिक्त किया। क्रमशः उसके एक मयणल्ला देवी नामकी पुत्री पैदा हुई। शिवभक्तोंने उसके सामने [किसी समय] ज्यों ही सोमेश्वरका नाम लिया त्यों ही उसको अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो आया कि- 'मैं पूर्व जन्ममें ब्राह्मणी थी। बारहों मासके उपवास करके प्रत्येकके उद्यापनके समय बारह वस्तुओंका दान किया करती थी। [इसके बाद] श्री सोमेश्वर को प्रणाम करनेके लिये प्रस्थान करके बाहुलोड नगर में आई। वहाँपर कर देनेमें असमर्थ हो [आगे] न जा सकी। उसीके शोकमें, यह प्रतिज्ञा करके कि 'भविष्य जन्ममें मैं इस करको मिटादेने वाली बनूं' - मर कर इस कुलमें पैदा हुई। ऐसी यह उसे पूर्व जन्मकी स्मृति हुई। इसके अनुसार बाहुलोड के करको हटा देनेकी इच्छासे उसने गूर्जर नरेश जैसे श्रेष्ठ वरकी कामना करके अपने पितासे यह सब वृत्तांत कहा। जयकेशी राजाने यह व्यतिकर जान कर अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा, श्रीकर्ण से अपनी पुत्री श्री मयणल्ला देवीको [पत्नीरूपमें ग्रहण करनेकी] स्वीकृति माँगी। श्रीकर्णने जब उसकी कुरूपताकी बात सुनी तो वह उदासीन हो गया। पर उस कन्याका मन उसीमें लगा देख कर पिताने मयणल्ला देवी को उसके यहाँ, स्वयंवरा रूपमें-जिसने स्वयं अपना वर चुन लिया है-उसीके पास भेज दिया। इधर कर्ण गुप्तरूपसे स्वयं ही उसे कुरूपा देख कर उसके प्रति सर्वथा निरादर हो गया। राजाके इस प्रकार त्यागके कारण अपनी आठ सखियोंके साथ मयणल्लादेवीको प्राणत्याग करनेकी इच्छुक जान कर श्रीकर्ण की माता उदयमति रानीने, उनकी यह विपद देखनेमें असमर्थ हो कर, उन्हींके साथ प्राणत्यागका सङ्कल्प किया। क्यों कि- १३०. महान् लोग अपनी विपत्तिसे उतने दुःखी नहीं होते जितने दूसरोंकी विपत्तिसे । अपने ऊपर आघात होने पर जो पृथ्वी अचल रहती है वही दूसरोंकी विपद् देख कर काँपने लगती है। इसके बाद महा उपद्रव उपस्थित हुआ जान कर मातृभक्तिवश श्री कर्णने उससे विवाह कर लिया। पर बादमें [बहुत समय तक] उसकी ओर नज़र उठा कर ताका भी नहीं। ८४) एक बार मुञ्जाल मंत्रीको कञ्चुकीसे यह मालूम हुआ कि राजाका मन किसी अधम स्त्रीके प्रति साभिलाष है। [यह जान कर] उसने ऋतुस्नाता मयणल्लादेवी को, उसीका रूप धारण कराके एकान्तमें १७-१८