प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
प्रकरण २२५-२२९ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १५१ चाहा। इस पर दोनोंके सैनिकोंमें लड़ाई छिड़ गई। असीम युद्धसे जूझते हुए, अतिप्रिय ऐसी देवभक्तिसे उत्साहित हो कर उसके पाँचों पुत्र, वहा मारे गये और वे मर कर पाँच क्षेत्रपाल हुए। उनके क्रमशः ये नाम हुए- १ कालमेघ, २ मेघनाद, ३ भैरव, ४ एकपद, और ५ त्रैलोक्यपाद। तीर्थके विरोधियोंको मृत्युके मुँह पहुँचाते हुए ये पाँचों विजयी हो कर पर्वतके चारों ओर वर्तमान हैं। २२७) फिर उनका धारा नामक पिता जो अकेला ही बच रहा था, उसने कान्यकुब्ज देशमें जा कर श्री बप्पभट्टसूरिके व्याख्यानके अवसरपर श्री संघकी आन दे कर यह कहा कि-' रैवतक तीर्थमें दिगंबरोंने अपनी वसति बना ली है और श्वेताम्बरोंको पाखंडी कह कर पर्वतपर चढ़ने नहीं देते हैं। इस लिये उनको जीतकर उस तीर्थका उद्धार कीजिये और अपने दर्शनकी प्रतिष्ठा करके तब फिर ये व्याख्यान दीजिए'। उसके ऐसे वचन रूप ईंधनसे जिनकी क्रोधरूप अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठी वैसे वे आचार्य उस आम राजा को साथ ले कर, उसी श्रेष्ठीके साथ, पर्वतकी उपत्यकामें पहुँचे। सात दिनोंमें, वादस्थानमें दिगंबरोंको पराजित करके संघके सामने श्री अम्बिकाको प्रत्यक्ष किया। 'इक्कोवि नमुक्कारो' और 'उज्जिन्तसेलसिहरे' ये दो गाथायें अम्बिकाके मुखसे सुन कर सितांबर दर्शनकी प्रतिष्ठा सिद्ध हुई और फिर वे पराजित दिगंबर 'बला- नक मंडपसे' झम्पापात करके नीचे गिर पड़े। इस प्रकार यह क्षेत्राधिपोत्पत्तिका प्रबंध समाप्त हुआ। * सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना। २२८) एक बार, भवानीने शिवसे पूछा कि-'तुम कितने कार्पटिकोंको राज्य देते रहते हो!'-उसके ऐसा पूछनेपर [शिवने कहा-] 'इन लाखों यात्रियोंमें जो कोई एक पूरा भक्ति-परायण होता है उसीको मैं राज्य देता हूं'। इस बातकी परीक्षाके लिये, गौरी (पार्वती)को पंगुमग्न बूढ़ी गाय बना कर और स्वयं मनुष्यरूप धारण कर, शिवजी तटस्थ खड़े रहे और कीचड़मेंसे गायका उद्धार करनेके लिये पथिकोंको बुलाने लगे। वे सब लोग तो सोमेश्वर नजदीक होनेसे उसके दर्शनके लिये बड़े उत्कंठित थे, इसलिये उन्होंने उसका उपहास किया। पर पथिकोंका कोई एक दल कृपालु हो कर उसके उद्धारका प्रयत्न करने लगा तो शिवजी सिंहरूप धारण करके उन्हें डराने लगे। तब उनमेंसे एक ही ऐसा पथिक निकला जो मृत्युकी भी परवा न करके उस गायके समीप पहुँचा। उसीको अडग बतला करके शिवने पार्वतीको बताया कि वही एक राज्यके योग्य है। इस प्रकार यह वासनाका प्रबंध समाप्त हुआ। * पूर्वजन्मका किया भोगना। २२९) सोमेश्वर की यात्राको जाता हुआ एक कार्पटिक रास्तेमें किसी लोहारके घर सोया। उस लोहारकी स्त्रीने अपने पतिको मार कर कृपाणिकाको उस कार्पटिकके सिरहाने रख दी और फिर चिल्लाने लगी। आरक्षक (राज्यके सिपाही) ने वहाँ आ कर उस अपराधीके हाथ काट डाले। इसमे वह सदैव उस देवको उपालंभन दिया करता। एक रातको देव प्रत्यक्ष हो कर बोला-'तुम अपने पूर्व-जन्मकी बात सुनो। एक बार दो भाइयोंमेंसे एकने एक बकरीके दोनों हाथोंसे कान पकड़े और दूसरेने उसे मार डाला। उसके बाद यह बकरी मर कर यह स्त्री हुई। जिसने इसे मारा था वह इस समय इसका पति हुआ। तुमने जो इसके कान पकड़े थे, इससे तुम्हारा समागम होनेपर, तुम्हारे हाथ काटे गये। सो इसमें मुझे क्यों उपालंभ देते हो!' इस प्रकार यह कृपाणिका-प्रबंध समाप्त हुआ। *
१५२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश जिनपूजाका माहात्म्य । २३०) प्राचीन कालमें, शखपुर नामक नगरमें शंख नामका राजा था। वहाँ पर, नाम और कर्म दोनोंहीसे 'धनद' (धन देने वाला) नामका एक सेठ था। उसने एक बार सोचा कि लक्ष्मी हाथीके समान चंचल है, अतः वह हाथमें उपहार ले कर राजाके पास आया और उसे संतुष्ट किया। राजाकी दी हुई भूमिमें, अपने चार पुत्रोंके साथ सलाह करके, शुभलग्नमें उसने एक जिनमंदिर बनवाया। उसमें, प्रतिष्ठित बिंबोंकी स्थापना करके उस प्रासादके व्यय-निर्वाहके लिये आमदनीके अनेक मद कायम किये। उसकी पूजाके लिये अनेक पुष्प, वृक्ष, लता आदिसे अलंकृत एक सुंदर बगीचा बनवा दिया और उसके कार्यचिन्तक गोष्ठिक नियुक्त किये। इसके अनन्तर, पूर्वकृत दुष्कर्मके फलके उदयसे क्रमशः उसकी लक्ष्मी घट गई और वह कर्जदार हो गया। मान- प्रतिष्ठाके म्लान हो जानेके कारण वह किसी गाँवमें जा कर रहने लगा। नगरमें जा-आ कर लड़के जो कुछ पैदा करते उसीपर गुजर करता हुआ वह काल व्यतीत करने लगा। एक बार, जब चातुर्मासिक पर्व निकट आया तो वहाँ जानेवाले पुत्रोंके साथ वह धनद भी शंखपुर पहुँचा। वहाँ अपने बनाये हुए प्रासादकी सीढ़ियों पर चढ़ते, उसके उद्यानकी पुष्प चुननेवाली ( माळिन ) ने उसे फूलोंकी डाली भेंट की। परमानंद निर्भर हो कर उसीसे उसने जिनेंद्रकी पूजा की। रातमें गुरुके सामने अपनी दुरवस्थाकी बड़ी निंदा करने लगा। तब उन्होंने उसे कपर्दी यक्षका आराधन करनेके लिये मंत्र दिया। फिर एक कृष्ण चतुर्दशीकी रातको उस मंत्रकी आराधना करके कपर्दी यक्षको प्रत्यक्ष किया। गुरुके उपदेशानुसार उससे, चातुर्मासिक दिनके अवसर पर जो पुष्प-चतुःसरिका (फूलकी चौसरी छड़ी) से जिनेशकी पूजा की थी उसके पुण्यफलकी याचना की। उसने कहा कि—'एक फूलकी पूजाका पुण्यफल भी, बिना सर्वज्ञके, मैं देनेमें असमर्थ हूँ'। फिर भी उस कपर्दी यक्षने, उस साधार्मिकके प्रति अतुल्य वात्सल्यभाव धारण करके, उसके घरके चारों कोनोंमें, सुवर्णपूर्ण चार कलश निधिरूपमें रख दिये, और वह तिरोहित हो गया। प्रातः काल वह अपने घर आया और धर्मकी निंदा करनेवाले उन पुत्रोंको वह धन समर्पण किया। वे भी आग्रहके साथ पितासे उस धनलाभका कारण पूछने लगे। इसपर, उनके हृदयमें धर्मके प्रभावका आविर्भाव करनेके लिये, जिनपूजाके प्रभावसे संतुष्ट हुए कपर्दी यक्ष द्वारा, इस संपत्तिके प्राप्त होनेकी बात कह सुनाई। वे भी सम्पत्ति पा कर फिर उसी जन्मस्थानमें जा कर रहे और अपने धर्मस्थानोंका व्ययनिर्वाह करने लगे। फिर विविध भाँति जिन शासनकी प्रभावना करते हुए वे विधर्मियोंके मनोंमें भी जैन धर्मके प्रभावको स्थापित करते रहे। इस प्रकार जिनपूजा संबंधी यह धनदका प्रबंध समाप्त हुआ। * श्री मेरुतुंगाचार्य विरचित प्रबन्धचिन्तामणिमें, विक्रमादित्यके कहे हुए पात्रविवेचनसे ले कर जिनपूजासंबंधी धनदके प्रबंध तकका वर्णनवाला, यह प्रकीर्णनामक पाँचवाँ प्रकाश समर्थित हुआ। [ इस प्रकाशकी ग्रन्थसंख्या ७७४ है। समग्र ग्रन्थकी श्लोक सख्या ३१५० है ]
ग्रन्थकारकी प्रशस्ति । बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्ध जनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे, तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटनरूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है ॥ १ ॥ यह, प्रबन्धसंग्रहरूप चिन्तामणि, चिरकाल तक हाथपर रहनेसे स्यमन्तक मणिका भ्रम पैदा करता है और हृदयमें स्थापन करनेपर प्रशंसनीय ऐसे विमल कौस्तुभ मणिकी कलाका सृजन करता है। सो इस ग्रन्थके अध्ययनसे विद्वान् लोग श्रीपति (विष्णु) की नाईं शोभित होते हैं ॥ २ ॥ मन्दबुद्धि हो कर भी, मैंने जैसा सुना वैसा ही, प्रबन्धोंका संकलन करके यह ग्रन्थ बनाया है। पण्डित लोग मत्सरताका त्याग करके, अपनी प्रज्ञाके उन्मेषसे इसकी उन्नति ही करें ॥ ३ ॥ ग्रहों रूपी कौड़ियोंसे जब तक द्युलोकमें सूर्य और चन्द्रमा, जुआड़ीकी तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह ग्रन्थ विद्यमान रहो ॥ ४ ॥ विक्रमादित्य संवत्के १३६१ वर्ष बीतनेपर, वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन यह ग्रन्थ समाप्त हुआ॥ ५॥ [ गद्यमें फिर यही कथन ] राजा श्री विक्रमके समयसे १३६१ वर्ष बीतनेपर वैशाख सुदि १५ रवि वारको, आज यहाँ श्री वर्द्धमान (काठियावाडके आधुनिक वढवान नगर) में यह प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थ समाप्त किया गया। ————:o:———— परिशिष्ट कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-सम्बन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध* श्रीमान् हेमचन्द्रके समान तो गुरु और श्रीमान् कुमारपालके समान जिनभक्त राजा न तो हुआ और न [ अब कभी ] होगा ॥ १ ॥ प्रभु श्री हेमाचार्यके पास ज्ञान-दान प्राप्त करके उसके पश्चात् श्री चौलुक्यचक्रवर्ती कुमारपालने जो हिंसाका निवारण किया था उसका [ रूपकात्मक ] प्रबन्ध इस प्रकार है — एक अवसर पर, अणहिल्लपुरमें, श्री कुमारपाल नामक राजाने, घुड़दौड़ की क्रीड़ा करनेके लिये जाते समय, एक ऐसी बालिकाको देखा जिसने अपने सौन्दर्यसे सुरसुन्दरियोंको भी मात कर दिया था और जिसका मुख बाल-चन्द्रमाके समान मनोहर था। यद्यपि वह
- टिप्पणी—यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध, इस ग्रन्थकी बहुसंख्यक पोथियोंमें लिखा हुआ मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिने ही इसकी रचना की है—पर ऐतिहासिक न हो कर यह एक रूपकात्मक प्रबन्ध है इसलिये इसको परिशिष्टके रूपमें ग्रन्थके अन्तमें जोड़ दिया मालूम देता है। कुमारपालने अपने धर्मगुरु आचार्य हेमचन्द्रसूरिके पास जैनधर्मकी गृहस्थ दीक्षा (श्रावकधर्मव्रत) स्वीकार करते समय, सबसे पहले जब अहिंसा व्रतका स्वीकार किया, उस समयको लक्ष्य करके इस रूपकात्मक प्रबन्धका प्रणयन किया गया है। इसमें अहिंसाको एक राजकन्या बनाई है जो आचार्य हेमचन्द्रके आश्रममें पलकर बड़ी रूपवती - सुकुमारी हो गई है। अन्यान्य राजाओंके अधार्मिक आचरण देख कर यह किसीके साथ विवाह करना नहीं चाहती; किन्तु, कुमारपाल जो आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य बना है उसके धर्मभावसे मुग्ध हो कर, आचार्यके आदेशसे यह उसका पाणिग्रहण कर लेती है—बस यही इस प्रबन्धका सारांश है। ३९
१५४ ] प्रबन्धचिन्तामणि सदाचार-प्रसरण-शीला थी फिर भी धीमी चालसे चलनेवाली थी । वह मुनियोंके साथ क्रीड़ा किया करती थी । अपनी सुकोमल वाणीके प्रपञ्चसे उसने त्रैलोक्यको चमत्कृत कर दिया था, और उसकी आकृति मन्द मुसकानसे खूब मधुर हो रही थी। इस बालिकाको देख कर उसके रूपसे हत-चित्त हो कर राजाने किसी निकटस्थ प्रसन्नचित्त (साधुजन) से पूछा कि- ' भला यह लड़की कौन है ?' उसने कहा कि-' अपार ऐसे शास्त्र-सागरके पारको देख लेनेके कारण जिन्होंने ' कलिकाल सर्वज्ञ' की प्रसिद्धि प्राप्त की है; द्वादश भेदोंवाली तपस्याकी आराधनाके द्वारा, अष्ट महासिद्धियोंको जिन्होंने वशमें कर लिया है; समग्र भूपालोंके शिर प्रदेशकी मणियोंने जिनके चरणोंका चुम्बन किया है; उन्हीं महर्षि भगवान् आचार्य श्री हेमचन्द्रके आश्रममें रहनेवाली यह अहिंसा नामक कन्या है। इसके यथार्थ रूपका निरूपण करनेमें स्मृति और पुराणके वचन तो पर्याप्त नहीं है, किन्तु समस्त जन्तुओंके पितृ-स्वरूप श्री जिनेन्द्र देवके उपदिष्ट स्पष्ट सिद्धान्तों और उपनिषदों द्वारा आभासित हृदयवाले किसी मुनिश्रेष्ठने इसकी स्थितिकी रीतिका पूरा निरूपण किया है - अन्य किसीने वैसा नहीं किया। यह वचन सुन कर राजा अपने आवासमें लौट आया। पर उस कन्याका स्वरूप जान कर, उसका अङ्गीकार करनेके लिये परम उत्सुक वह राजा, उसके पाणिग्रहणके द्वारा अपनी भाग्य-सम्पद आदिको कृतार्थ करनेकी कामनासे, अपने 'विवेक' नामक परम मित्रके बताये हुए मार्गसे उन मुनियोंके आश्रममें जा पहुंचा। उस कन्याके सामने उसीका 'सदाचार' नामक भाई खेल रहा था। उसीने जा कर सम-चित्तवृत्तिवाले महर्षि श्री हेमचन्द्र सूरिको राजाके आगमनका वृत्तान्त बतलाया। राजाने पृथ्वीतलपर मस्तक टेक कर, उन्हें भक्ति और हर्षके साथ, प्रणाम किया और फिर उस कन्याका स्वरूप पूछा। इस पर वे बोले-' हे नरपुंगव ! सुनो, त्रैलोक्यके एकमात्र सम्राट् श्री अर्हद्धर्मकी पट्ट महादेवी श्रीमती अनुकंपा देवीके कुक्षि सरोवरकी राजहंसी जैसी, नि सीम सुन्दरी यह 'अहिंसा' नामक कन्या है। जिस लग्नमें यह कन्या पैदा हुई थी उस लग्नके प्रभावको इसके सर्वज्ञ पिताने इस प्रकार निर्दिष्ट किया था-' यह अतीव पुण्यवती, सुदतियोंकी शिरोमणि कन्या है। पुत्रजन्मोत्सवसे भी अधिक प्रशंसनीय इसका जन्म है। क्यों कि- लक्ष्मी [ रूप कन्यासे] समुद्रको और वाग्देवी [ रूप कन्यासे] ब्रह्माको निष्कृत देख कर, कुपुत्रके दु खसे सूर्य और चन्द्रमा ताप और कलंकका त्याग नहीं करते हैं ॥ २ ॥ इस लिये क्रमशः बढ़ती हुई यह कन्या अपने अनुरूप वर न पानेके कारण वृद्ध-कुमारी हो जाने पर किसी अनुरूप राजासे साग्रह विवाहित होगी। इस प्रकार सतियोंमें श्रेष्ठ यह कन्या अपने पति और पिता दोनोंको उन्नतिकी पराकाष्ठापर पहुँचा देगी। और इससे विवाह करनेवाला वह पुरुष भी खेलहीमें महा-मोह नामक राजाको जीत कर परमानन्दका भाजन बनेगा।' यह सुन कर राजा बोला- 'प्रभो ! यह अर्हद्धर्मकी पुत्री इस समय आपके ही चरण कमलोंकी उपासना करती है, अतः इसका विवाह आपकीके कहनेसे होगा, अन्य किसीसे नहीं। सो पूज्य-पाद मुझपर प्रसन्न हों, विषादगण विषण्ण हों, महामोहका विजय करना प्रारम्भ हो, और [ उससे ] मैं परमानन्द प्राप्त करूँ।' उसके इस कथनके बाद गुरु बोले-' यह वृद्धा कुमारी है, इसका सङ्कल्प दुष्पूरणीय है। यह सङ्कल्प इसीके मुँहसे सुन कर विवाह करना चाहिये, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार उनकी अमृतकी जैसी वह वाणी सुन कर, उसने कन्याके पास सुबुद्धि नामक दासी भेज कर उसे बुलवाया। वह दासी उस कन्याके पास जा कर भक्ति-पूर्वक प्रणाम करके बोली-'स्वामिनि, राजकन्ये, [ आज ] तुम धन्यतमा हो, जो तुम्हें, अठारह देशोंके सम्राट्, और समस्त सामन्तोंके मस्तक-मणिक्योंकी किरण मालासे जिनका चरण अलंकृत है वह चौलुक्य-चक्रवर्ती तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं।' उसकी इस बातसे कुछ मुँह बना कर, उपहासके उल्लासके साथ, उसने कहा-' सखि, जिस महान् साम्राज्यका अन्त नरक है उसके लोभकी बातका विस्तार
कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध [ १५५ करना रहने दे ! मैं तो अनुकूल प्रेमीको चाहती हूँ । पुरुष प्रायः परुष आशयवाले, और नाना प्रकारके अनुरागवाले होते हैं; उनसे मेरा क्या काम है । क्यों कि- रूप यौवन सम्पन्ना कन्याका अविवाहित भी रहना वरन् अच्छा है, किन्तु कलाहीन, अननुकूल, कु-पतिसे विडंबित होना [ अच्छा ] नहीं ॥ ३ ॥ पर सुनो, - अगर दरिद्र हो कर भी पति जो प्रियकारी हो तो उससे विवाहित स्त्रीको जैसा सुख होता है वैसा सुख ईश्वर ( बड़े धनसंपन्न ) से भी नहीं प्राप्त होता । [ देखो न ] भागीरथी ( गंगा ) को शिव तो शिरपर धारण करते हैं, पर लक्ष्मीके पति ( विष्णु ) उसे पैरसे भी नहीं छूने ! सो मुझे वरण करनेकी अभिलाषा तो वृथा ही समझो । क्यों कि मेरी प्रतिज्ञाका किसी महाराजासे भी पूरा होना कठिन है ।' ऐसा कहनेवाली उस युवतीसे वह (दासी) बोली-' सखि ! मैं तुम्हारी प्रियकारिणी सखी हूँ, कुछ अपडाप तो करनेकी नहीं; सो तुम अपना अभिमत मुझे स्पष्ट कह बताओ । मेरा भी नाम सुबुद्धि है, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा उस कुमारपाल राजासे पूरी कराऊँगी ।' ऐसा कहनेपर वह बोली- सत्यवक्ता, परलक्ष्मीका त्यागी, समस्त जीवोंको अभय-दाता, और सदा अपनी ही स्त्रीसे सन्तुष्ट, [ ऐसा जो पुरुष होगा ] वही मेरा पति होगा ॥ ५ ॥ दुर्गतिके बन्धु जैसे द्यूत स्वभाववाले सात पुरुषों (अर्थात्, सात व्यसनों) को जो अपने चित्तसे दूर निकाल फेंक देगा वही मेरा पति होगा ॥ ६ ॥ मेरे सहोदर भाई सदाचारको अपने हृदयासनपर बैठा कर एक चित्तसे जो उसकी सेवा करेगा वही मेरा पति होगा ॥ ७ ॥ उसकी इस बातको सुन कर वह बोली-' ऐ सुलोचने ! सुनो, मैं यथार्थनामा (सुबुद्धि) तब हूँगी जब तुम्हारी प्रतिज्ञाको पूरा करनेके लिये, श्री हेमसूरिको आगे कर, समस्त लोकके सामने, तुम्हारे इन प्रतिज्ञात अर्थोंका समर्थन करा कर, तुम्हें परिणीत कराऊँगी । और तभी, तुम मुझे अपनी चतुर सखी मानना, नहीं तो तिनकेसे भी गयी बीति समझना ।' यह कह कर, फिर राजाकी समीपमें जा कर उसने उसकी वह कठिन प्रतिज्ञा कह सुनाई । उसकी इस अवज्ञामयी प्रतिज्ञाके कठोर भावसे हृदयमें सन्तप्त हो कर राजा बड़ी बेचैनी धारण करने लगा । तब सुबुद्धिने कहा-' हे श्रीनिधे ! धीरज धरो, पौरुष-शालियोंको दुष्कर क्या है ? और इस बाधाके दूर करनेके उपाय भी तो हैं । महर्षि हेमचन्द्रका अनुसरण करो और उनका उपदेश सुनो !' इस प्रकार उसकी बात सुन कर विनयका सहारा पा कर यह राजा सूरिके पास गया । उनके पद-पद्मोंपे प्रणाम कर उनकी कन्याकी उस प्रतिज्ञाका वृत्तान्त कहा । [ सूरि बोले-] ' वत्स ! यदि परिणयनकी चाह है तो फिर उसकी प्रतिज्ञा पूरी करो । यह कन्या अपने पतिकी निःसीम उन्नतिके लिये होगी । क्यों कि- उत्तम वंशोत्पन्न, धन्य और गुणाधिका सती कन्यासे विवाह करके कौन प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता ! लक्ष्मी और पार्वतीके साथ विवाह कर गोप ( कृष्ण ) और उग्र ( शिव ) ने जिस तरह [ प्रतिष्ठा ] पाई थी । ॥ ८ ॥ उनकी यह बात सुन कर, दुरित समूहको दूर कर देनेवाली ऐसी हस्तावलम्बी किये हुए उस राजाने, अनेक प्रकारके अभिग्रह धारण करके, उस कन्याका वाग्दान प्राप्त किया और वह बड़ा प्रमुदित हुआ । सं० १२१६ मार्गशीर्ष सुदि द्वितीयाको, बलवान् लग्नमें, संवेग नामक हाथीपर आरूढ हो, रत्नत्रयसे अलंकृत, शुभमनरूप वस्त्र धारण करके, दक्षिण हस्तमें कंकण बाँध कर, यह [हेमसूरिकी] पौषधशालाके द्वारपर आया । उस समय श्वेतच्छत्र द्वारा उसका आतप निवारण किया जा रहा था; श्रद्धा नामक बहन उसकी चरण-आरती उतार रही थी;
१५६ ] प्रबन्धचिन्तामणि गुरुभक्ति, देशविरति, समिति, गुप्ति आदि सखियाँ वरातिन बन कर मंगल गान कर रहीं थीं; अमारि-घोषणाके पटह बज रहे थे; परिग्रह-परिमाणरूप व्रतके मिषसे याचक जनोंको यथेष्ट दान दिया जा रहा था; पापरूप कचरेको दूर हटाया जा रहा था; सद्बोध पुष्पोंसे सन्मार्गकी राजवीथियाँ सुगंधित की जा रही थीं; तब कन्याकी माँ अनुकंपा महादेवी ने श्रीअर्हन् के साक्षी रहते प्रोक्षण किया। इस प्रकार उस राजाने अहिंसाका- पाणिग्रहण किया। उस समय, तारामेळुक पर्वमें परमानन्द हुआ। इसके बाद, नवांगवेदी महोत्सवके स्थानमें, ३६ हजार श्लोक ग्रन्थपरिमाण, हेम सूरिकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र नामक शास्त्र स्थापित किया गया। वेदीके पात्र-स्थापन और पाँच कपर्दक (कोडियों) के स्थापनकी जगह; वीस-संख्यक वीतरागस्तव स्थापित किये गये। शमी काष्ठके स्थानपर द्वादश प्रकाशात्मक योगशास्त्र ग्रन्थ स्थापित किया गया। उसके परिकरके रूपमें, हेम सूरिके अन्यान्य लक्षण, साहित्य, तर्क और इतिहास प्रमुख शास्त्रोंकी रचना हुई। मूलगुण और उत्तर गुणोंसे इस वेदिकाको दृढ़ करके, उसमें ज्ञानरूप अग्नि जलाई गई, और 'चत्तारिमंगल' रूप इस मांगलिक सूत्रके उच्चारणसे मंगल किया गया। उस समय उस कन्याके मुखमण्डनके लिये, राजाने ७२ लाख रुपयोंकी आमदनीवाला 'रुदती कर' (अर्थात् निःसन्तान विधवा स्त्रियोंके राज्यग्राह्य धन) का त्याग करने रूप दान किया। उसी समय उसका पट्टबन्ध किया गया (-उसे पट्ट महादेवी बनाया गया), और उसके पिताके निवास-योग्य १४४४ विहार बनवाये गये। फिर हिंसा (जो राजाकी पूर्वपत्नी थी) अपनी सौत अहिंसाकी इस प्रकारकी उन्नतिको देख कर, अपना पराभव निवेदन करनेके लिये, अपने पिता विधाताके पास गई। बहुत दिन बाद देखनेके कारण तथा पराभवके दुःखसे विरूपसी बनी हुई उसको न पहचान, पिताने उससे पूंछा कि- 'सुंदरी ! तुम कौन हो ? '- 'हे तात विधाता ! मैं तुम्हारी प्रिय पुत्री हिंसा हूं।' -'तूं ऐसी दीनकी तरह क्यों है ? '-' पराभवके कारण। '-' वह (पराभव) किससे हुआ ? '- ' क्या बताऊं ! 'कहो न '- 'हेमाचार्यके कहनेसे, उस परम गुणवान् कुमारपाल नृपतिने मुझे अपने हृदय, मुंह, हाथ और उदरसे उतार कर, पृथ्वितलसे निकाल दिया ॥ ९ ॥ उसकी यह बात सुन कर ब्रह्मा बोले कि-'सत्यप्रतिज्ञ ऐसा कुमारपाल देव जो पहले तुझमें अनुरक्त हो कर भी, उस भेषधारी साधुके कथनको सुन कर, अब विरक्त हो गया है; तो फिर मैं अब तेरे लिये कोई ऐसा अच्छा पति ढूंढ निकालूँगा जो तेरा ही एकच्छत्र राज्य कर देगा। इसलिये तुम धीर धरो'-यह कह कर उसे अपने समीप रखा। अहिंसा देवीके साथ श्री कुमारपाल नृपति अपने इस जीवन-ही-में अतुलित महानन्दका अनुभव करता हुआ, चौदह वर्ष तक, सुख पूर्वक राज्य करता रहा। इसके बाद उसकी एक पहली प्रिया जो कीर्ति थी उसको देशान्तरमें पठा कर, जब उसने स्वर्गको अलंकृत किया, तो उसी समय उसके प्रेमकी प्रसादपूर्ण क्रीड़ा- ओंका स्मरण करती हुई यह अहिंसा देवी भी, कलिमलिन जनोंके पापस्पर्शका परिहार करनेकी इच्छासे, उसके साथ 'सहगमन' कर गई। इस प्रकार श्री कुमारपालका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्ध बतानेवाला यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध समाप्त हुआ। -:०:-