प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध [ १५५ करना रहने दे ! मैं तो अनुकूल प्रेमीको चाहती हूँ । पुरुष प्रायः परुष आशयवाले, और नाना प्रकारके अनुरागवाले होते हैं; उनसे मेरा क्या काम है । क्यों कि- रूप यौवन सम्पन्ना कन्याका अविवाहित भी रहना वरन् अच्छा है, किन्तु कलाहीन, अननुकूल, कु-पतिसे विडंबित होना [ अच्छा ] नहीं ॥ ३ ॥ पर सुनो, - अगर दरिद्र हो कर भी पति जो प्रियकारी हो तो उससे विवाहित स्त्रीको जैसा सुख होता है वैसा सुख ईश्वर ( बड़े धनसंपन्न ) से भी नहीं प्राप्त होता । [ देखो न ] भागीरथी ( गंगा ) को शिव तो शिरपर धारण करते हैं, पर लक्ष्मीके पति ( विष्णु ) उसे पैरसे भी नहीं छूने ! सो मुझे वरण करनेकी अभिलाषा तो वृथा ही समझो । क्यों कि मेरी प्रतिज्ञाका किसी महाराजासे भी पूरा होना कठिन है ।' ऐसा कहनेवाली उस युवतीसे वह (दासी) बोली-' सखि ! मैं तुम्हारी प्रियकारिणी सखी हूँ, कुछ अपडाप तो करनेकी नहीं; सो तुम अपना अभिमत मुझे स्पष्ट कह बताओ । मेरा भी नाम सुबुद्धि है, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा उस कुमारपाल राजासे पूरी कराऊँगी ।' ऐसा कहनेपर वह बोली- सत्यवक्ता, परलक्ष्मीका त्यागी, समस्त जीवोंको अभय-दाता, और सदा अपनी ही स्त्रीसे सन्तुष्ट, [ ऐसा जो पुरुष होगा ] वही मेरा पति होगा ॥ ५ ॥ दुर्गतिके बन्धु जैसे द्यूत स्वभाववाले सात पुरुषों (अर्थात्, सात व्यसनों) को जो अपने चित्तसे दूर निकाल फेंक देगा वही मेरा पति होगा ॥ ६ ॥ मेरे सहोदर भाई सदाचारको अपने हृदयासनपर बैठा कर एक चित्तसे जो उसकी सेवा करेगा वही मेरा पति होगा ॥ ७ ॥ उसकी इस बातको सुन कर वह बोली-' ऐ सुलोचने ! सुनो, मैं यथार्थनामा (सुबुद्धि) तब हूँगी जब तुम्हारी प्रतिज्ञाको पूरा करनेके लिये, श्री हेमसूरिको आगे कर, समस्त लोकके सामने, तुम्हारे इन प्रतिज्ञात अर्थोंका समर्थन करा कर, तुम्हें परिणीत कराऊँगी । और तभी, तुम मुझे अपनी चतुर सखी मानना, नहीं तो तिनकेसे भी गयी बीति समझना ।' यह कह कर, फिर राजाकी समीपमें जा कर उसने उसकी वह कठिन प्रतिज्ञा कह सुनाई । उसकी इस अवज्ञामयी प्रतिज्ञाके कठोर भावसे हृदयमें सन्तप्त हो कर राजा बड़ी बेचैनी धारण करने लगा । तब सुबुद्धिने कहा-' हे श्रीनिधे ! धीरज धरो, पौरुष-शालियोंको दुष्कर क्या है ? और इस बाधाके दूर करनेके उपाय भी तो हैं । महर्षि हेमचन्द्रका अनुसरण करो और उनका उपदेश सुनो !' इस प्रकार उसकी बात सुन कर विनयका सहारा पा कर यह राजा सूरिके पास गया । उनके पद-पद्मोंपे प्रणाम कर उनकी कन्याकी उस प्रतिज्ञाका वृत्तान्त कहा । [ सूरि बोले-] ' वत्स ! यदि परिणयनकी चाह है तो फिर उसकी प्रतिज्ञा पूरी करो । यह कन्या अपने पतिकी निःसीम उन्नतिके लिये होगी । क्यों कि- उत्तम वंशोत्पन्न, धन्य और गुणाधिका सती कन्यासे विवाह करके कौन प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता ! लक्ष्मी और पार्वतीके साथ विवाह कर गोप ( कृष्ण ) और उग्र ( शिव ) ने जिस तरह [ प्रतिष्ठा ] पाई थी । ॥ ८ ॥ उनकी यह बात सुन कर, दुरित समूहको दूर कर देनेवाली ऐसी हस्तावलम्बी किये हुए उस राजाने, अनेक प्रकारके अभिग्रह धारण करके, उस कन्याका वाग्दान प्राप्त किया और वह बड़ा प्रमुदित हुआ । सं० १२१६ मार्गशीर्ष सुदि द्वितीयाको, बलवान् लग्नमें, संवेग नामक हाथीपर आरूढ हो, रत्नत्रयसे अलंकृत, शुभमनरूप वस्त्र धारण करके, दक्षिण हस्तमें कंकण बाँध कर, यह [हेमसूरिकी] पौषधशालाके द्वारपर आया । उस समय श्वेतच्छत्र द्वारा उसका आतप निवारण किया जा रहा था; श्रद्धा नामक बहन उसकी चरण-आरती उतार रही थी;
१५६ ] प्रबन्धचिन्तामणि गुरुभक्ति, देशविरति, समिति, गुप्ति आदि सखियाँ वरातिन बन कर मंगल गान कर रहीं थीं; अमारि-घोषणाके पटह बज रहे थे; परिग्रह-परिमाणरूप व्रतके मिषसे याचक जनोंको यथेष्ट दान दिया जा रहा था; पापरूप कचरेको दूर हटाया जा रहा था; सद्बोध पुष्पोंसे सन्मार्गकी राजवीथियाँ सुगंधित की जा रही थीं; तब कन्याकी माँ अनुकंपा महादेवी ने श्रीअर्हन् के साक्षी रहते प्रोक्षण किया। इस प्रकार उस राजाने अहिंसाका- पाणिग्रहण किया। उस समय, तारामेळुक पर्वमें परमानन्द हुआ। इसके बाद, नवांगवेदी महोत्सवके स्थानमें, ३६ हजार श्लोक ग्रन्थपरिमाण, हेम सूरिकृत त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र नामक शास्त्र स्थापित किया गया। वेदीके पात्र-स्थापन और पाँच कपर्दक (कोडियों) के स्थापनकी जगह; वीस-संख्यक वीतरागस्तव स्थापित किये गये। शमी काष्ठके स्थानपर द्वादश प्रकाशात्मक योगशास्त्र ग्रन्थ स्थापित किया गया। उसके परिकरके रूपमें, हेम सूरिके अन्यान्य लक्षण, साहित्य, तर्क और इतिहास प्रमुख शास्त्रोंकी रचना हुई। मूलगुण और उत्तर गुणोंसे इस वेदिकाको दृढ़ करके, उसमें ज्ञानरूप अग्नि जलाई गई, और 'चत्तारिमंगल' रूप इस मांगलिक सूत्रके उच्चारणसे मंगल किया गया। उस समय उस कन्याके मुखमण्डनके लिये, राजाने ७२ लाख रुपयोंकी आमदनीवाला 'रुदती कर' (अर्थात् निःसन्तान विधवा स्त्रियोंके राज्यग्राह्य धन) का त्याग करने रूप दान किया। उसी समय उसका पट्टबन्ध किया गया (-उसे पट्ट महादेवी बनाया गया), और उसके पिताके निवास-योग्य १४४४ विहार बनवाये गये। फिर हिंसा (जो राजाकी पूर्वपत्नी थी) अपनी सौत अहिंसाकी इस प्रकारकी उन्नतिको देख कर, अपना पराभव निवेदन करनेके लिये, अपने पिता विधाताके पास गई। बहुत दिन बाद देखनेके कारण तथा पराभवके दुःखसे विरूपसी बनी हुई उसको न पहचान, पिताने उससे पूंछा कि- 'सुंदरी ! तुम कौन हो ? '- 'हे तात विधाता ! मैं तुम्हारी प्रिय पुत्री हिंसा हूं।' -'तूं ऐसी दीनकी तरह क्यों है ? '-' पराभवके कारण। '-' वह (पराभव) किससे हुआ ? '- ' क्या बताऊं ! 'कहो न '- 'हेमाचार्यके कहनेसे, उस परम गुणवान् कुमारपाल नृपतिने मुझे अपने हृदय, मुंह, हाथ और उदरसे उतार कर, पृथ्वितलसे निकाल दिया ॥ ९ ॥ उसकी यह बात सुन कर ब्रह्मा बोले कि-'सत्यप्रतिज्ञ ऐसा कुमारपाल देव जो पहले तुझमें अनुरक्त हो कर भी, उस भेषधारी साधुके कथनको सुन कर, अब विरक्त हो गया है; तो फिर मैं अब तेरे लिये कोई ऐसा अच्छा पति ढूंढ निकालूँगा जो तेरा ही एकच्छत्र राज्य कर देगा। इसलिये तुम धीर धरो'-यह कह कर उसे अपने समीप रखा। अहिंसा देवीके साथ श्री कुमारपाल नृपति अपने इस जीवन-ही-में अतुलित महानन्दका अनुभव करता हुआ, चौदह वर्ष तक, सुख पूर्वक राज्य करता रहा। इसके बाद उसकी एक पहली प्रिया जो कीर्ति थी उसको देशान्तरमें पठा कर, जब उसने स्वर्गको अलंकृत किया, तो उसी समय उसके प्रेमकी प्रसादपूर्ण क्रीड़ा- ओंका स्मरण करती हुई यह अहिंसा देवी भी, कलिमलिन जनोंके पापस्पर्शका परिहार करनेकी इच्छासे, उसके साथ 'सहगमन' कर गई। इस प्रकार श्री कुमारपालका अहिंसाके साथ विवाह-संबन्ध बतानेवाला यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध समाप्त हुआ। -:०:-