प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमायासिद्धि इसी प्रकार माया तो अदृश्य है किन्तु उसका कार्य यह जगत् दृश्यरूप है, और माया तो यही है कि वह अपने नाशसे ही आनन्द देनेवाली होती है। रजनीवातिदुरन्ता न लक्ष्यतेऽत्र स्वभावोऽस्याः। सौदामनीव नश्यति मुनिभिः सम्प्रेक्ष्यमाणैव ॥१०४॥ यह अन्धकारमयी रात्रिके समान दुरन्त है, इसके स्वभावका कुछ पता ही नहीं चलता; क्योंकि मुनिजनोंद्वारा विचारपूर्वक देखी जाते ही यह बिजलीके समान तुरन्त नष्ट हो जाती है। माया ब्रह्मोपगताविद्या जीवाश्रया प्रोक्ता। चिद्चिद्ग्रन्थिश्चेतस्तदक्षयं ज्ञेयमामोक्षात् ॥१०५॥ यह ब्रह्मके अधीन होनेसे 'माया' और जीवके आश्रित होनेसे 'अविद्या' कही जाती है। यह जड और चेतनकी ग्रन्थि ही 'चित्त' है। इसे जबतक मोक्ष न हो, अक्षय ही जानना चाहिये। घटमठकुड्यैरावृतमाकाशं तत्तदाह्वयं भवति। तद्वदविद्यावृतमिह चैतन्यं जीव इत्युक्तः ॥१०६॥ घट, मठ और भित्ति आदि उपाधियोंसे आवृत आकाश भी घटाकाश, मठाकाश आदि तदनुकूल नामवाला हो जाता है, उसी प्रकार अविद्यासे आवृत शुद्ध, चेतन ही जीव कहलाता है। ३१