प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
प्रबोधसुधाकर उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः सङ्गरहितो भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः । अकस्मादस्माकं यदि न कुरुते स्नेहमथ त- द्वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि ॥२४५॥ आप हमारे पिता तो उदासीन, निष्क्रिय, सदा निर्गुण और असंग ठहरे; अतः अब हमारे जीवनकी और क्या गति होगी। अच्छा यदि आप हमसे अकारण ही स्नेह नहीं कर सकते तो अपने निर्मल निवास-स्थानरूप इस अन्तःकरणमें तो बसो । लोकाधीश त्वयीशे किमिति भवभवा वेदना स्वाश्रितानां सङ्कोचः पङ्कजानां किमिह समुदिते मण्डले चण्डरश्मेः। भोगः पूर्वार्जितानां भवति भुवि नृणां कर्मणां चेदवश्यं तन्मे दृष्टैर्नृपुष्टैर्ननु दनुजनृपैरूर्जितं निर्जितं ते ॥२४६॥ आप लोकाधीश स्वामीके रहते हुए आपके आश्रितोंको संसारजन्य क्लेश क्यों उठाना पड़ता है ? क्या सूर्यमण्डलके उदय होनेपर भी कमल कभी मुरझाते हैं ? यदि कहो कि संसारमें मनुष्योंको अपने पूर्वकृत कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है, तो मनुष्योंके मांससे पुष्ट हुए उन मेरे जाने हुए दैत्यराजोंने अवश्य आपके बलको जीत लिया था । ७०
अनुग्रह नित्यानन्दसुधानिधेरधिगतः सन्नीलमेघः सता- मौत्कण्ठ्यप्रबलप्रभञ्जनभरैराकर्षितो वर्षति । विज्ञानामृतमद्भुतं निजवचोधाराभिरारादिदं चेतश्चातक चेन्न वाञ्छसि मृषाक्रान्तोऽसि सुप्तोऽसि किम् नित्यानन्दरूपी अमृतके समुद्रसे निकला हुआ और सज्जनों- की उत्कण्ठारूप प्रबल वायुसे उड़ाकर लाया हुआ सत्स्वरूप नीलमेघ तेरे पास ही अद्भुत विज्ञानामृतकी अपने वचनरूपी धाराओंमें वर्षा कर रहा है। अरे चित्तरूपी पपीहे ! यदि तुझे उसे पीनेकी इच्छा नहीं होती तो तुझे व्यर्थ ही किसीने पकड़ रक्खा है, या तू सो गया है ? चेतश्चञ्चलतां विहाय पुरतः सन्धाय कोटिद्वयं तत्रैकत्र निधेहि सर्वविषयानन्यत्र च श्रीपतिम् । विश्रान्तिर्हितमप्यहो क्व नु तयोर्मध्ये तदालोच्यतां युक्त्या वानुभवेन यत्र परमानन्दश्च तत्सेव्यताम् ॥ अरे चित्त ! चञ्चलताको छोड़कर अपने सामने तराजूके दोनों पलड़ोंको रख; उनमेंसे एकमें समस्त विषयोंको और दूसरेमें भगवान् श्रीपतिको रख। उन दोनोंमेंसे किसमें अधिक शान्ति और हित है इसका विचार कर, और युक्ति तथा अनुभवसे जिसमें परमानन्दकी प्रतीति हो उसीका सेवन कर। ७१
प्रबोधसुधाकर पुत्रान्पौत्रमथ स्त्रियोऽन्ययुवतीर्वित्तान्यथोऽन्यद्धनं भोज्यादिष्वपि तारतम्यवशतो नालं समुत्कण्ठया । नैतादृग्यदुनायके समुदिते चेतस्यनन्ते विभौ सान्द्रानन्दसुधार्णवे विहरति स्वैरं यतो निर्भयम् ॥ पुत्र, पौत्र, स्त्रियाँ, अन्य युवतियाँ, विभव तथा अन्य प्रकार- के धन और भोज्य आदि पदार्थोंमें तारतम्य होनेसे इनमें कभी उत्कण्ठाकी शान्ति नहीं होती; किन्तु अनन्त और अति गम्भीर आनन्दामृतसिन्धु श्रीयदुनायकके चित्तमें उदय होकर स्वच्छन्द विहार करनेपर ऐसा नहीं होता, क्योंकि उस समय चित्त स्वच्छन्द एवं निर्भय हो जाता है। काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनं किञ्चित्फलं स्वेप्सितं केचित्स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः । अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगलध्यानावधानार्थिनां किं लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवर्गैश्च किम् ॥ कोई लोग तो सकाम उपासनाके द्वारा नित्यप्रति अपने किसी अभीष्ट फलकी प्रार्थना किया करते हैं, और कोई योग तथा यज्ञादि अन्य साधनोंसे स्वर्ग और अपवर्गकी याचना करते हैं। किन्तु श्रीयदुनाथके चरण-कमलोंके ध्यानमें ही सावधान रहनेके इच्छुक हमलोगोंको लोकसे, दमसे, राजासे, स्वर्गसे और अपवर्गसे क्या काम है ? ७२
अनुग्रह आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः । लोहमपि चुम्बकाश्मा सम्मुखमात्रं जडं यद्वत् ॥२५१॥ भगवान् श्रीपति अपने आश्रितमात्र पुरुषको अपनी ओर इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे सामने आये हुए जड लोहेको चुम्बक खींच लेता है । अयमुत्तमोऽयमघमो जात्या रूपेण सम्पदा वयसा । श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे ॥ भगवान् कृपा करते समय यह नहीं देखते कि जाति, रूप, सम्पत्ति और अवस्थाके विचारसे अमुक पुरुष तो उत्तम है और अमुक अधम । अन्तःस्थभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः । खदिरश्चम्पक इव वा प्रवर्षणं किं विचारयति ॥२५३॥ यह अन्तर्यामी परमात्मारूप महामेघ पुरुषके आन्तरिक भावका ही भोक्ता है । वर्षाके समय मेघ यह कब विचारता है कि यह तो खदिर (खैर) है और यह चम्पा है । यद्यपि सर्वत्र समस्तथापि नृहरिस्तथाप्येते । भक्ताः परमानन्दे रमन्ति सदयावलोकेन ॥२५४॥ यद्यपि भगवान् सर्वत्र समान हैं तथापि वे नृहरि (मनुष्यरूप हरि) भी हैं; तथा ये भक्तजन उनकी दयामयी दृष्टिसे नित्य परमानन्दमें मग्न रहते हैं । ७३
प्रबोधसुधाकर सुतरामनन्यशरणाः क्षीराद्याहारमन्तरा यद्वत् । केवलया स्नेहदृशा कच्छपतनयाः प्रजीवन्ति ॥२५५॥ जिनका कोई अन्य आश्रय नहीं है ऐसे कछुईके बच्चे जिस प्रकार दूध आदि आहारके बिना ही केवल माताकी स्नेह-दृष्टिसे ही पलते हैं, उसी प्रकार अनन्य भक्त भी भगवान्की दया-दृष्टिके सहारे ही जीवन-निर्वाह करते हैं । यद्यपि गगनं शून्यं तथापि जलदामृतांशुरूपेण । चातकचकोरनाम्नोर्दृढभावात्पूरयत्याशाम् ॥२५६॥ यद्यपि आकाश शून्यरूप है तथापि चातक और चकोर नामक पक्षियोंकी दृढ़ भावनासे मेघ और चन्द्रमाके रूपमें वह उनकी आशाओंको पूर्ण कर देता है ! यद्द्व्रजतां पुंसां दृग्वाङ्मनसामगोचरोऽपि हरिः । कृपया फलत्यकस्मात्सत्यानन्दामृतेन विपुलेन ॥ इसी प्रकार वाणी और मनके अगोचर होकर भी श्रीहरि अपने शरणागत पुरुषोंकी कामनाओंको अकारण ही कृपापूर्वक सत्यानन्दरूपी प्रचुर अमृतसे पूर्ण कर देते हैं । इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपाद- शिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रबोधसुधाकरः समाप्तः ७४
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याद रखिये ! अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीके चरणकमलोंकी भक्तिके बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जैसे वस्त्रको क्षारयुक्त जलसे शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्तको भक्तिसे निर्मल किया जा सकता है।