प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)
Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
अनुग्रह आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः । लोहमपि चुम्बकाश्मा सम्मुखमात्रं जडं यद्वत् ॥२५१॥ भगवान् श्रीपति अपने आश्रितमात्र पुरुषको अपनी ओर इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे सामने आये हुए जड लोहेको चुम्बक खींच लेता है । अयमुत्तमोऽयमघमो जात्या रूपेण सम्पदा वयसा । श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे ॥ भगवान् कृपा करते समय यह नहीं देखते कि जाति, रूप, सम्पत्ति और अवस्थाके विचारसे अमुक पुरुष तो उत्तम है और अमुक अधम । अन्तःस्थभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः । खदिरश्चम्पक इव वा प्रवर्षणं किं विचारयति ॥२५३॥ यह अन्तर्यामी परमात्मारूप महामेघ पुरुषके आन्तरिक भावका ही भोक्ता है । वर्षाके समय मेघ यह कब विचारता है कि यह तो खदिर (खैर) है और यह चम्पा है । यद्यपि सर्वत्र समस्तथापि नृहरिस्तथाप्येते । भक्ताः परमानन्दे रमन्ति सदयावलोकेन ॥२५४॥ यद्यपि भगवान् सर्वत्र समान हैं तथापि वे नृहरि (मनुष्यरूप हरि) भी हैं; तथा ये भक्तजन उनकी दयामयी दृष्टिसे नित्य परमानन्दमें मग्न रहते हैं । ७३
प्रबोधसुधाकर सुतरामनन्यशरणाः क्षीराद्याहारमन्तरा यद्वत् । केवलया स्नेहदृशा कच्छपतनयाः प्रजीवन्ति ॥२५५॥ जिनका कोई अन्य आश्रय नहीं है ऐसे कछुईके बच्चे जिस प्रकार दूध आदि आहारके बिना ही केवल माताकी स्नेह-दृष्टिसे ही पलते हैं, उसी प्रकार अनन्य भक्त भी भगवान्की दया-दृष्टिके सहारे ही जीवन-निर्वाह करते हैं । यद्यपि गगनं शून्यं तथापि जलदामृतांशुरूपेण । चातकचकोरनाम्नोर्दृढभावात्पूरयत्याशाम् ॥२५६॥ यद्यपि आकाश शून्यरूप है तथापि चातक और चकोर नामक पक्षियोंकी दृढ़ भावनासे मेघ और चन्द्रमाके रूपमें वह उनकी आशाओंको पूर्ण कर देता है ! यद्द्व्रजतां पुंसां दृग्वाङ्मनसामगोचरोऽपि हरिः । कृपया फलत्यकस्मात्सत्यानन्दामृतेन विपुलेन ॥ इसी प्रकार वाणी और मनके अगोचर होकर भी श्रीहरि अपने शरणागत पुरुषोंकी कामनाओंको अकारण ही कृपापूर्वक सत्यानन्दरूपी प्रचुर अमृतसे पूर्ण कर देते हैं । इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपाद- शिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रबोधसुधाकरः समाप्तः ७४
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याद रखिये ! अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजीके चरणकमलोंकी भक्तिके बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जैसे वस्त्रको क्षारयुक्त जलसे शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्तको भक्तिसे निर्मल किया जा सकता है।