प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ प्रासादमण्डने एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ध्वजादंड का विस्तार पौन अंगुल का रक्खे । पीछे पचास हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके रक्खें ॥४३॥ ध्वजादंड की रचना— सुवृत्तः सारदारुश्च ग्रन्थिकोटरवजिंतः । पर्वभिर्विषमैः कार्यः समग्रन्थिः सुखावहः ॥४४॥ ध्वजादंड बहुत अच्छा और किसी प्रकार की गांठ या पोलाण आदि दोषो से रहित, तथा मजबूत काष्ठ का सुन्दर एवं गोलाकार बनावें । दंड में पर्व (विभाग) विषम संख्या में और ग्रन्थी (चूड़ी) समसंख्या में रखना सुखदायक है ॥४४॥ विषमपर्व वाले ध्वजादंड के तेरह नाम— “जयन्तस्त्वेकपर्वश्च त्रिपर्वशत्रु मर्दनः । पिङ्गल; पञ्चपर्वश्च सप्तपर्वश्च सम्भवः ॥ श्रीमुखो नवपर्वश्च आनन्दो रुद्रपर्वकः । त्रिदेवो विश्वपर्वश्च तिथिभिर्दिव्यशेखरः ॥ मुनीन्दुभिः कालदण्डो महोत्कटो नवेन्दुतः । सूर्याख्यस्त्वेर्काविशत्या कमलो वह्निनेत्रतः ॥ तत्त्वपर्वो विश्वकर्मा दण्डनामानि पर्वतः । शस्ताशस्तत्वमेतेषामभिधानगुणोद्भवम् ॥” अप० सू० १४४ एक पर्व वाला जयंत, तीन पर्ववाला शत्रु मर्दन, पांच पर्व का पिंगल, सात पर्व का संभव, नव पर्व का श्रीमुख, ग्यारह पर्व का आनंद, तेरह पर्व का त्रिदेव, पंद्रह पर्व का दिव्यशेखर, सत्रह पर्व का कालदंड, उन्नीस पर्व का महाउत्कट, इक्कीस पर्व का सूर्य, तेबीस पर्व का कमल और पच्चीस पर्व का विश्वकर्मा कहलाता है । वे तेरह प्रकार के डंड के नाम पर्व के अनुसार है और नाम के अनुसार शुभाशुभ फल देने वाले है । ध्वजादण्ड की मर्कटी (पाटली)— दण्डदीर्घषडंशेन मर्कट्यर्धेन विस्तृता । अर्द्ध चन्द्राकृतिः पार्श्वे घटोर्ध्वं कलशस्तथा ॥४५॥ ध्वजादंड की लंबाई के छठे भाग की मर्कटी (पाटली) की लंबाई रक्खें । लंबाई से आधी विस्तार मे रक्खे । (विस्तार के तीसरे भाग की मोटाई रक्खे ।) पाटली का सम्मुख